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पढ़ाई नहीं, रोमांच: बच्चों के सीखने का वह राज़ जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं -डॉ. रीटा अरोड़ा सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर ,करनाल


 

पढ़ाई नहीं, रोमांच: बच्चों के सीखने का वह राज़ जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं


“दादी, ये देखो... मैंने नदी बना दी!”

छह साल की अनाया मिट्टी, कंकड़ और पत्तों से आँगन में एक छोटी-सी दुनिया बना रही थी। उसने बीच में पानी की पतली धारा छोड़ी थी, किनारे पर छोटे-छोटे पत्थर सजाए थे और पत्तों को नाव बनाकर बहा रही थी।

दादी चुपचाप उसे देख रही थीं।

थोड़ी देर बाद अनाया ने कहा, “अगर यहाँ बड़ा पत्थर रख दूँ तो पानी रुक जाता है... और अगर रास्ता खाली कर दूँ तो पानी आगे चला जाता है।”

दादी मुस्कराईं।

बिना किसी किताब, ब्लैकबोर्ड या होमवर्क के बच्ची ने उस दिन बहाव, रुकावट और रास्ते का एक छोटा-सा विज्ञान समझ लिया था।

दादी ने मन ही मन सोचा - बच्चे सचमुच खेलते नहीं, खेल-खेल में जीवन पढ़ते हैं।

दरअसल, हममें से अधिकांश लोग पढ़ाई को गंभीरता से जोड़कर देखते हैं। हमारे मन में शिक्षा की एक पारंपरिक तस्वीर बनी हुई है - शांत कमरा, मेज़ पर खुली किताबें, कॉपी में लिखता बच्चा और सामने बैठा कोई बड़ा व्यक्ति, जो उसे समझा रहा है।

लेकिन बच्चों की दुनिया इससे बिल्कुल अलग होती है।

वे दौड़ते हुए सीखते हैं, गिरते हुए सीखते हैं, छूकर सीखते हैं, बनाकर सीखते हैं, बिगाड़कर सीखते हैं और सबसे ज़्यादा - खेलते हुए सीखते हैं।

शायद यही वजह है कि जब शिक्षा खेल का रूप ले लेती है, तब वह बोझ नहीं रह जाती। वह एक रोमांचक यात्रा बन जाती है, जिसमें बच्चा खुद-ब-खुद शामिल होना चाहता है।

बचपन की सबसे सुंदर बात यही है कि बच्चे सीखने के लिए अलग से तैयारी नहीं करते। उनके लिए हर चीज़ एक सवाल है और हर सवाल एक खेल।

कंकड़ उनके लिए गिनती बन जाते हैं। चॉकलेट जोड़-घटाव सिखा देती है। रंग आकारों की पहचान करा देते हैं। गुड़िया का खेल रिश्तों की समझ दे देता है। और मिट्टी का घरौंदा उन्हें कल्पना, संतुलन और धैर्य सिखा देता है।

यानी जहाँ हम केवल खेल देखते हैं, वहाँ बच्चा चुपचाप दुनिया को समझ रहा होता है।

आज के समय में बच्चों के ऊपर पढ़ाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। छोटी उम्र में बड़े-बड़े सिलेबस, भारी बस्ते, लगातार टेस्ट और तुलना की संस्कृति ने सीखने की खुशी को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

कई बच्चे पढ़ाई से इसलिए नहीं भागते कि उनमें क्षमता नहीं होती, बल्कि इसलिए भागते हैं क्योंकि शिक्षा उनके मन की भाषा में नहीं उतर पाती।

बच्चों की भाषा आदेश नहीं है, अनुभव है।

उनकी भाषा डर नहीं है, जिज्ञासा है।

उनकी भाषा बोझ नहीं है, खेल है।

जब कोई बच्चा चार चॉकलेट में से दो अपने दोस्त को दे देता है, तो वह केवल बाँटना नहीं सीख रहा होता, बल्कि घटाव का पहला पाठ भी समझ रहा होता है। जब वह ब्लॉक्स से ऊँचा टॉवर बनाता है और वह गिर जाता है, तो वह असफलता से घबराना नहीं, फिर से शुरू करना सीखता है। जब वह टीम में कोई खेल खेलता है, तो उसे नियम, अनुशासन, सहयोग और नेतृत्व का अर्थ समझ आता है। ये सब बातें किताबें बता सकती हैं, पर खेल उन्हें बच्चे के अनुभव में उतार देता है।

खेल-आधारित शिक्षा की सबसे बड़ी ताकत यही है कि इसमें बच्चा दर्शक नहीं रहता, सहभागी बन जाता है। वह केवल सुनता नहीं, करता है। केवल याद नहीं करता, अनुभव करता है। और जो बात अनुभव बन जाती है, वह आसानी से भूलती नहीं।

आज की डिजिटल दुनिया ने सीखने के नए रास्ते भी खोले हैं। बच्चों के हाथों में मोबाइल, टैबलेट और स्क्रीन आ चुके हैं। माता-पिता की चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि हर स्क्रीन उपयोगी नहीं होती। लेकिन हर स्क्रीन हानिकारक भी नहीं होती।

सवाल यह नहीं कि बच्चा स्क्रीन देख रहा है या नहीं।

सवाल यह है कि वह स्क्रीन से क्या सीख रहा है।

यदि कोई इंटरैक्टिव गेम बच्चे को भाषा सिखा रहा है, कोई डिजिटल पहेली उसकी समस्या-समाधान क्षमता बढ़ा रही है, कोई सिमुलेशन उसे विज्ञान समझा रहा है या कोई सुरक्षित ऑनलाइन गतिविधि उसे डिजिटल दुनिया के जोखिमों से सावधान कर रही है, तो वही स्क्रीन सीखने का शक्तिशाली माध्यम बन सकती है।

आज दुनिया भर में “एडुटेनमेंट” यानी शिक्षा और मनोरंजन का संगम तेज़ी से बढ़ रहा है। इसमें बच्चे पढ़ाई को आदेश की तरह नहीं, खोज की तरह अपनाते हैं। वे किसी मिशन को पूरा करते हैं, पहेलियाँ सुलझाते हैं, सवालों के जवाब ढूँढ़ते हैं और इसी प्रक्रिया में सीखते चले जाते हैं।

असल में खेल केवल मनोरंजन नहीं हैं। वे बच्चों के मन की प्रयोगशाला हैं।

यहीं बच्चा निर्णय लेना सीखता है। यहीं वह हारकर भी दोबारा उठना सीखता है। यहीं वह दूसरों के साथ चलना सीखता है। यहीं वह अपनी कल्पना को आकार देना सीखता है।

शतरंज उसे धैर्य और दूरदृष्टि देता है।

मोनोपॉली उसे पैसों और रणनीति की शुरुआती समझ देती है।

लुका-छिपी उसे अवलोकन, प्रतीक्षा और सूझ-बूझ सिखाती है।

और मिट्टी से खेलना उसे यह याद दिलाता है कि सृजन हाथ गंदे किए बिना नहीं होता।

फिर भी हम अक्सर खेल को पढ़ाई का विरोधी मान लेते हैं। हम कहते हैं - “बस खेलते मत रहो, थोड़ा पढ़ भी लो।”

शायद हमें यह वाक्य बदलना होगा।

हमें कहना होगा - “खेलो भी, क्योंकि खेलते हुए भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।”

शिक्षा का भविष्य केवल किताबों, कॉपियों और ब्लैकबोर्ड तक सीमित नहीं रहने वाला। आने वाले समय में अनुभव आधारित शिक्षा, गतिविधियाँ, प्रयोग, सिमुलेशन और खेल-आधारित लर्निंग बच्चों को अधिक गहराई से तैयार करेंगे।

क्योंकि भविष्य में केवल जानकारी काफी नहीं होगी।

महत्वपूर्ण यह होगा कि बच्चा सोच सके, सवाल पूछ सके, निर्णय ले सके, सहयोग कर सके और बदलती परिस्थितियों में खुद को ढाल सके।

और ये गुण रटने से नहीं, अनुभव से आते हैं।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि जब बच्चा आनंद के साथ सीखता है, तो उसके भीतर पढ़ाई का डर नहीं, सीखने की भूख पैदा होती है। यही भूख उसे जीवनभर सीखने वाला इंसान बनाती है।

शायद हमें बच्चों को अपनी गंभीर दुनिया में जल्दी खींच लाने की जगह, थोड़ा उनकी दुनिया में उतरना चाहिए।

उनकी मिट्टी में, उनकी रंगीन पेंसिलों में, उनकी कागज़ की नावों में, उनकी पहेलियों में, उनके सवालों में।

और जब उसकी आँखों में किसी नई खोज की चमक उतरती है।

यही शिक्षा का असली क्षण होता है।

क्योंकि सच्चाई यही है -

जिस दिन पढ़ाई खेल जैसी लगने लगे, उस दिन बच्चा केवल पाठ याद नहीं करता, वह जीवन को समझना शुरू कर देता है।

और वही समझ जीवन भर उसके साथ चलती है।

 --डॉ. रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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