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कहानी : पहचान - आरती चौगुले, पुणे



कहानी : 

पहचान

    बंगले के गेट पर गाड़ी रुकते ही मेरी तंद्रा टूटी| मैने अपना बैग संभाला और कार से नीचे उतरकर गेट की ओर चलदी| साथ ही पति वेद, बेटा वरुण और बहू वर्षा भी.

घर मे प्रवेश करते ही सब बैठक मे सोफे पर बैठ गये| सभी के चेहरे पर दिनभर की थकान स्पष्ट थी फिर भी सभी के चेहरे खुशी और आनंद से चमक रहे थे| आज का कार्यक्रम बहुत यशस्वी हुआ था|

कुछ देर बाद वर्षा किचन से कॉफी ले आयी. डिनर हम लोग बाहर से कर के आये थे| कॉफी का आस्वाद लेते हुए हम सबने आज के कार्यक्रम पर थोडी चर्चा की और फिर गुड-नाइट कह कर अपने कमरे में आ गये| कमरे मे आते ही मैने कपडे बदले और बिस्तर पर आकर लेट गयी और सोने का प्रयत्न करने लगी, पर नींद मेरी आँखो से कोसो दूर थी|

अतीत की कुछ घटनाएँ मेरे मानस-पटल पर चल-चित्र की भाँति चल रही थी| पाँच महीने पूर्व मै मुंबई एअर-पोर्ट पर परिवार के साथ बैठी हुइ अपनी फ्लाइट का इंतजार कर रही थी, तभी किसि ने मुझे आवाज दी ‌‘विनि-विनि‌’|

मैने चौक कर देखा यहाँ मुझे ‌‘विनि‌’ कहकर पुकारनेवाला कौन है? देखा सामने मेरे ही उम्र की एक आधुनिक वेषभूषा की महिला खडी हुइ मुस्कुरा रही थी| उसने मुझे तुरंत गले से लगा लिया और बोली पहचाना मुझे? अब तक मै थोडी संभल गई थी| तुम नीरा होन? मैने तुम्हारी आवाज से तुम्हे पहचान लिया|

हाँ मै नीरा ही हूँ. मैने नीरा का परिचय अपने परिवार से कराया| नीरा मेरी सबसे अच्छी मित्र थी| पडोसी भी थी| पचास वर्ष पूर्व हम दोनो के परिवार ग्वालियर में एक दूसरे के पडोसी थे| मै और नीरा हमउम्र थे| एक ही विद्यालय में एक ही कक्षा मे दोनो ने बारहवी तक पढाई की| साथ पढ़ते, साथ खाते-पीते, दिन का अधिकांश समय दोनो साथ ही व्यतीत करते|

नीरा को संगीत का शौक था और मुझे चित्रकला का| नीरा मुझे कहती ‌‘विनि, तू फाइन आर्टस‌’ कर| तू इतने सुंदर और सजीव चित्र बनाती है कि देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाते है| मै उसकी बात पर मुस्कुरा देती|

इंसान का सोचा हुआ सब वास्तव में हो नहीं पाता|

मै इंटर पास करते ही पापा ने मेरी शादी तय कर दी| मै आगे पढना चाह रही थी| मुझे उस समय शादी नहीं करनी थी| पर मम्मी-पापा का कहना था, घर-परिवार अच्छा है, लडका भी अच्छी नौकरी में है| वे लोग तुरंत शादी चाह रहे है| तुम शादी के बाद भी पढ सकती हो| तुम्हारे बाद तुम्हारी दो छोटी बहनो की भी जिम्मेदारी हम पर है| और इस तरह ‌‘चट मंगनी-पट ब्याह‌’ हो गया|

शादी के बाद ससुराल की जिम्मेदारियाँ, बहू के कर्तव्य, वरुण और विभा का जन्म, उनका पालन-पोषण, पढाई-लिखाई सारे कर्तव्यो का भार ढोते-ढोते, मै अपना अस्तित्व ही भूल गई| रंग और तूलिका से मेरा कोई सरोकार ही नही रहा|

मेरी शादी के दो वर्ष बाद ही नीरा ने बी.ए. करते ही उसकी भी शादी हो गई| मै चाहकर भी, पारिवारिक जिम्मेदारियो के कारण उसकी शादी में शामिल नही हो पाई| फिर नीरा से मिलना कभी हो नही पाया| माँ ने बताया था वह बंगलौर में है| पर प्रत्यक्ष मे कभी मिल नही सके और उस दिन अचानक एअर-पोर्ट पर नीरा से मिलना, नीरा ने बताया वह अपनी बेटी के घर बर्मिंघम(यू.के.) जा रही है|

मेरा बेटा-बहू भी पिछले तीन साल से लंडन में है, तो हम लोग भी बेटे के साथ यू.के. जा रहे थे|

बातो-बातो में नीरा ने मेरी बहू वर्षा को बताया “विनि बहुत अच्छी चित्रकार है| बहुत ही सुंदर और सजीव चित्र बनाती है| ” मैने उसे बताया, वह सब अतीत की बात है, आज मेरा चित्रकारी से कोई संबंध नही है| थोडी देर इधर-उधर की गपशप के चलते हम लोगों की फ्लाइट आ गई और हम सब प्लेन में बैठ गये|

नीरा ने अपना यू.के का पता और फोन नंबर मुझे और वर्षा को दिया| फिर हम सब पाँच महिने पहले यू.के. आ गये|

यहाँ आने के चार दिन बाद ही मेरा जन्म-दिन था| सुबह-सुबह वर्षा मेरे कमरे में आई और मुझे जन्म-दिन की शुभ-कामनाएँ देते हुए फूलों का गुलदस्ता भेंट किया और एक बड़ा सा बंडल पकडाते हुए बोली “इसमें आपकी पसंद का सामान है” इसको स्वीकार करें|

मैने बहुत मना करने पर भी वह नही मानी, और मुझे पैकेट थमाकर ऑफिस चली गई|

मैने उत्सुकतावश पैकेट खोला तो मै विस्मित हो गई, उसमें बहुत ही अच्छी क्वालिटि का चित्रकारी का सारा सामान मौजूद था| शाम को केक-कटिंग के समय बहू ने मुझसे पूछा “माँ, आपको उपहार पसंद आया?” मैने कहा “उपहार तो बहुत अच्छा है लेकिन अब अडसठ वर्ष की उम्र मे मै इसका क्या करूंगी?” वर्षो से मैने रंग और तूलिकाको स्पर्श तक नहीं किया है|

वर्षा बोली, “माँ, आपके पास ईश्वर-प्रदत्त कला है, कलाकार की कला कभी नही मरती| वह सदैव उसके मन-मस्तिष्क में रहती है| मुझे विश्वास है आप बहुत अच्छे चित्र बनायेंगी|”

दुसरे दिन से मैने चित्र बनाने प्रारंभ किये| जैसे-जैसे मै चित्र बना रही थी, मेरा आत्मविश्वास बढता जा रहा था| और पिछले पाँच महिनो मे मैने बहुत सारी पेंटिंग्ज बना डाली|

वर्षा ने नीरा के साथ फोन पर बात कर के लंडन में एक हॉल बुक किया और आज मुझे सरप्राइज देकर, मेरी पेंटिंग्ज की प्रदर्शनी रखी गई| मेरी सभी पेंटिंग्ज को बहुत-बहुत प्रशंसा मिली और मेरे अधिकांश चित्र बहुत ही अच्छे दामो में बिक चुके थे|

मेरे लिये ये सब स्वप्नवत था| मै खुशी से फूली नही समा रही थी| मेरी पहचान एक कलाकार के रूप में स्थापित हो चुकी थी|

मैने वर्षा और नीरा दोनो को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया जिनके प्रयत्नो से मुझे यह पहचान मिली है|

- आरती चौगुले, पुणे

मो.नं. 9850960735

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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