काव्य :
अभी आज फिर कहना है
कितना कुछ अनकहा
रहा
कितना कुछ कह
गये थे हम
हम तुम जब थे साथ
कितना कुछ सह
गये थे हम
चल रही थी जिंदगी
अपनी-अपनी
पटरी पर
फिर बिन कहे-सुने
मोड़ मुड़ साथ छोड़
गये थे तुम।
जिन राहों से चले
गये तुम
दिल हम अपना वहीं छोड़ आए
लौट आओगे कभी
जब यादों से
न छुप पाओगे
कई बातें अभी भी
मन में शोर
मचा रहीं
नयनों की पुतलियाँ
लौट-लौट उस
दोराहे पर जा खड़ी
होती,
इंतजार बनीं।
आजाओ फिर एक बार
दिल की दुनिया
करने आबाद
खामोशियों में दबे भावों
को फिर से खुलकर
खिलाने को
टूटती साँसों को रवानी
देने को
धड़कने फिर जवां होने को तड़प रहीं
*अभी आज फिर कुछ*
*कहना है*
आजाओ फिर एक बार।
- डॉ.नीलम , अजमेर
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