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गोवा क्रांति: स्वतंत्रता, स्वाभिमान और जनसंघर्ष का प्रतीक - डाॅ. राकेश सक्सेना , एटा


 

गोवा क्रांति: स्वतंत्रता, स्वाभिमान और जनसंघर्ष का प्रतीक

   - डाॅ. राकेश सक्सेना , एटा

      भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति तक सीमित नहीं था अपितु यह विदेशी दासता और औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध व्यापक राष्ट्रीय चेतना का आन्दोलन था। 15 अगस्त  1947 ई० को भारत स्वतंत्र हो गया किन्तु देश के गोवा, दमन और दीव भू-भाग अभी भी पुर्तगाल के अधीन थे। इसकी स्वतंत्रता व स्वाभिमान के लिए गोवा की जनता ने लम्बा संघर्ष किया। इसी संघर्ष की स्मृति में प्रतिवर्ष 18 जून को गोवा क्रांति दिवस मनाया जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से गोवा व्यापार, संस्कृति और समुद्री सम्पर्क का प्रमुख केन्द्र रहा। 1510 ई० में पुर्तगाली सेनापति अफोंसो द अल्बुकर्क ने गोवा पर अधिकार कर लिया था तदन्तर लगभग 451 वर्षों तक यह पुर्तगाली शासन के अधीन रहा। पुर्तगाली शासन का मूल स्वरूप दमनकारी था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकार, लोकतांत्रिक गतिविधियाँ निषिद्ध थीं। यहाँ के लोग स्वयं को भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का हिस्सा मानते थे और पुर्तगाली शासन से मुक्ति चाहते थे, उनके अंदर स्वतंत्रता व आत्मनिर्णय की भावना विकसित हो रही थी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में गोवा के प्रथम राष्ट्रवादी नेता त्रिस्ताओ द ब्रागांजा कुन्हा ने यहाँ की जनता को पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन के विरुध्द संगठित करने का प्रयास किया। उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को मजबूती देते हुए स्पष्ट रूप से कहा था कि गोवा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भारत का अभिन्न अंग है इसलिए इसे स्वतंत्र होना चाहिए।

      गोवा क्रांति का प्रारम्भ 18 जून 1946 ई० की उस ऐतिहासिक घटना से है जब डाॅ० राममनोहर लोहिया अपने मित्र डाॅ० जूलियाओ मेनेजेस के निमंत्रण पर गोवा पहुँचे थे और मडगाँव में आयोजित सार्वजनिक सभा में उन्होंने पुर्तगाली शासन के विरुध्द आवाज उठाई। उन्होंने जनता से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया। लोहिया ने अहिंसक प्रतिरोध, जनसंगठन और लोकतांत्रिक संघर्ष की नीति अपनाई। उनकी गिरफ्तारी के उपरांत आन्दोलन रुका नहीं अपितु व्यापक जनान्दोलन का रूप लेने लगा था। इसमें किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं व बुद्धिजीवियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। पुर्तगाली सरकार ने इन आन्दोलनों को बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया फिर भी आन्दोलन जारी रहे। पुर्तगाली शासन लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध था। प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण था, आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया जाता था।इस प्रकार गोवा मुक्ति आन्दोलन केवल राजनीतिक संघर्ष ही नहीं, मानवाधिकारों की रक्षा का भी संघर्ष बन गया था।

       अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों का उदय हुआ। एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त की। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोवा के प्रश्न को उठाया लेकिन पुर्तगाली सरकार उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी। जब सभी शांतिपूर्ण प्रयास असफल हो गए तो भारत सरकार ने दिसम्बर 1961ई० में विजय ऑपरेशन आरम्भ किया। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त अभियान चलाकर गोवा, दमन और दीव को मुक्त कराया। 19 दिसम्बर 1961ई० को पुर्तगाली गवर्नर ने आत्मसमर्पण कर दिया और गोवा विदेशी शासन से मुक्त हो गया।

      गोवा क्रांति स्वतंत्रता और स्वाभिमान का प्रतीक, जनशक्ति की गाथा है। यह संघर्ष इस बात का द्योतक है कि कोई भी समाज लम्बे समय तक दमन और पराधीनता को स्वीकार नहीं कर सकता। गोवा के नागरिकों ने अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ संघर्ष किया और अंतत: सफलता प्राप्त की। आज गोवा क्रांति दिवस हमें उन वीर सेनानियों, किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं व बुद्धिजीवियों के त्याग और बलिदान को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है जिन्होंने गोवा की स्वतंत्रता में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

   -  डाॅ.राकेश सक्सेना, 

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 

68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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