काव्य :
तुम मेरे हो
धड़कनों में बसे,
संगीतमम सरगम हो
और क्या कहूँ,तुम मेरी
ग़ज़ल हो।
बहर,काफिया ,मतला
या सुखन का आशियाँ
होऔर क्या कहूँ,तुम मेरी सजल हो।
लय,सुर,ताल,स्वर-
साम्यता से सधे,संघर्षो
से जीती प्रीत हो और
क्या कहूँ तुम मेरी हसल हो।
छंदों से आच्छादित, अलंकृत अलंकारों से,
धनानंद की पीर,बिहारी के श्रृंगार हो और क्या कहूँ तुम मेरे गीत हो।
कभी लक्षणों के बियाबां
,कहीं उपमाओं, बिम्बों
में लक्षित कठिन शब्दों में भी, तुम मेरे सरल हो।
- डा.नीलम , अजमेर
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