काव्य :
क्रेता
हम सब बिके हुए हैं
किसके हाथों, पता नहीं
शायद,
विचारवानों के, विद्वानों के
सभ्यताओं के, शासनों के
सत्ताओं या सत्ताधीशों के।
या कि
अपने अहम् के, मद मोह के
समाज के, संसार के
द्वेष के, आग्रहों के
दुराग्रहों के,
पता नहीं।
बस यही पता करना है
हम किसके हाथों बिके हैं
यह पता चल जाए
तो मुक्त हो सकते हैं।
क्रेता से, छुटकारा
पा सकते हैं।
लेकिन, बहुत सजग रहने की
ज़रुरत है।
- डॉ सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र
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सत्येंद्र सिंह जी,
ReplyDeleteसजग करती रचना लिखी है। अंतर्मुख कर देने के लिए साधुवाद! 🙏
लतिका जाधव