काव्य :
नमन प्रेमचन्द
जीवन कथा के मर्म को .संवेदना के दर्द को
तुमने दिया आधार मानवता के पावन धर्म को।
जिनकी व्यथा के मोड़ पर रिश्ते नये बनते रहे
है नमन हिन्दी के प्रखर दिनमान प्रेमचन्द को।
उन पूस की रातों में फिर गूंजा गरीबी का रूदन
जब भूख की पीड़ा पली बेचा गया फिर से कफन।
जब ईदगाहों में किसी हामिद के सपने खो गये
गोदान करते आज भी होरी कहीं पर सो गए।
अब ह्रदय के हर भाव में अर्पित तुम्हारी कलम को
है शत नमन हिन्दी के प्रखर दिनमान प्रेमचन्द को।
है पंच को तुमने दिया परमेश्वर का नाम भी
वो बूढ़ी काकी भूख से आंसू बहाती आज भी।
फिर निर्मलायें रो रही दुनिया के झंझावात में
वे बड़े घर की बेटियाँ अब फिर लगी हैं दांव में ।
माटी के पावन दीप तुम गौरव दिया हर मान को
है शत नमनहिन्दी के प्रखर दिनमान प्रेमचन्द को।
----पद्मा मिश्रा ़जमशेदपुर
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