आलेख :
अर्थहीन दौड़ : एक सवर्ण का आक्रोश
नमक बिना दाल की कसम, जैसे जीवन फीका है, वैसे ही शक्ति और पहचान के बिना इंसान का वजूद भी मिट्टी है। दुनिया कहती है कि शक्ति से सब कुछ हासिल होता है, पर आज के दौर में तो शक्ति और पहचान—दोनों ही 'आरक्षण' की भेंट चढ़ गई हैं। ये कशमकश ठीक उस मोची जैसी है जो चौराहे की फुटपाथ पर बैठ सबकी जूतियाँ चमकाता है, पर खुद के पैरों में फटे जूतों की बदौलत काँटे और ठोकरें ही उसकी नियति बन जाते हैं।
गोरखपुर की इसी मिट्टी में खड़ी होकर मैं पूछती हूँ—आखिर कब तक?
सवर्ण होना क्या कोई गुनाह है? जन्म लेते ही हमारे गले में एक ऐसा बोझ डाल दिया गया है जिसे ढोते-ढोते आज की पूरी पीढ़ी कुबड़ी हो गई है। हमारे रास्तों में बिछे कैक्टस के फूल नहीं, बल्कि जातिवादी नीति का वह जहर है जो हर कदम पर हमारी योग्यता का गला घोंट देता है। हाथ में जो सुई है, वह फटे जूतों की नहीं, बल्कि अपने ही सपनों की तुरपाई कर रही है, जो वक्त से पहले ही उधड़ जाते हैं।
कहते हैं कि 'देश बदल रहा है', 'जाति-पाति अब मायने नहीं रखती'। अरे भाई! अगर वाकई देश बदल गया है, तो ये आरक्षण की बेड़ियाँ किसके पैरों में हैं? अगर सबको बराबर का दर्जा है, तो शिक्षा प्रणाली में ये कैसा 'भेदभाव'? क्यों एक बच्चा अपनी मेहनत से आसमान छूने की दौड़ में भागता है और दूसरा सिर्फ 'कोटे' के सहारे जीत की पट्टी बाँध लेता है? ये खेल अब बंद होना चाहिए।
अफसोस तो इस बात का है कि हम उस भारत के वासी हैं, जहाँ राम और कृष्ण को भी अपने हक़ और धर्म की स्थापना के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में उतरना पड़ा था। जब भगवान को अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ा, तो हम तो बस उस सवर्ण समाज का हिस्सा हैं, जिसे खिलौना बना कर रख दिया गया है।
हम अपनी ही माटी में दौड़ रहे हैं, पर यह दौड़ अर्थहीन है। हम अपनी ही जमीन पर बेगाने हो रहे हैं। अब बस बहुत हुआ! यह सवर्ण समाज तब तक चैन से नहीं बैठेगा जब तक योग्यता का सम्मान वापस नहीं मिलता। उम्मीद है कि वह दिन दूर नहीं, जब आरक्षण का यह घना अंधकार छँटेगा और प्रतिभा का सूर्य फिर से अपनी पूरी तपिश के साथ चमकेगा।
— अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर
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