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लघुकथा : बदले ताले - विभा रानी श्रीवास्तव, पटना


लघुकथा : 

बदले ताले

“तुम्हें पता है, पिछले आपातकाल में सबसे ज़्यादा किस चीज़ की आवाज़ आती थी?” वाइन ग्लास बढ़ाते हुए प्रभाकर जी ने पूछा।

“मुझे ऐसी कोई भी चीज नापसन्द है जो मेरे दिमाग को भ्रमित करती है,” रोहन ने इंकार रूप में अपना हाथ और अनभिज्ञता स्वरूप सिर हिलाया।

“खामोशी की…। जब आधी रात को लोग उठाए जाते थे, तब पूरा मोहल्ला जागता था, मगर कोई खिड़की नहीं खुलती थी।” प्रभाकर जी ने कहा।

“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।

प्रभाकर जी ना तो मुस्कराए और ना कुछ कहा। धीरे से उठे, अलमारी खोली और वही पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी, जिसे वे बरसों पहले जेल से लौटते समय साथ लाए थे।

“जब सोशल मीडिया बोलना बन्द कर दें…” रोहन ने कहना चाहा।

“…तब इंसान एक-दूसरे को पढ़ना शुरू करते हैं।” प्रभाकर जी ने उसकी बात पूरी कर दी—

शाम ढल रही थी। चाय की दुकान पर लोग पहले की तरह बैठे थे। मौसम, महँगाई, क्रिकेट और राजनीति—सब पर बातें हो रही थीं। रोहन ने डायरी खोली। पहला वाक्य “इतिहास दोहराया गया है” लिखने से पहले उसने एक बार चारों ओर देखा। शहर बिल्कुल सामान्य था।

—विभा रानी श्रीवास्तव, पटना
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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