काव्य :
बूंद
बूंद करती है
आसमान से ज़मीं तक
सफ़र धीरे-धीरे।
फिर मेरे गुल्हड़ के पेड़ पर
कुछ देर ठहरती है,
और समा जाती है
धरती में—
एक गुलाब के निर्माण के लिए,
किसी देवता के अर्पण हेतु,
या मेरी प्रेयसी के लावण्य का
हिस्सा बनने के लिए।
बूंद, तुम रहती हो
मेरे दिल में,
और बूंद-बूंद
जीवन-अमृत बरसाती हो।
बूंद, बादल, ज़मीन और गुलाब—
सभी प्रतिबद्ध हैं
जीवन के अस्तित्व के लिए,
और जीवन में सौंदर्य-बोध के लिए।
कुछ बूंद-सी प्रतिबद्धता
मुझमें भी भर देना;
मैं बारूद के खेतों में
गुलाब लगाना चाहता हूँ।
— कवि: के. पी. गुप्ता ,भोपाल
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