काव्य :
झेल रही हैं दर्द बेटियाँ'
झेल रही हैं दर्द बेटियाँ,गिद्धों के संसार में।
लगा रहीं हैं मौत गले ये,अन्धों की सरकार में।
धोखा देकर धूर्त भेड़िये,करते इन पर वार हैं।
आकाओं के वरद हस्त से,करते खल व्यभिचार हैं।
ये लोभी लम्पट अरु कामी,बैठे हर घर द्वार में।
झेल रही हैं दर्द बेटियाँ,गिद्धों के संसार में।
रक्षक बन भक्षक ये सारे,करते गहरा प्लान हैं।
इनके आगे एंटी शोहदे,दल सारे ही म्लान हैं।
प्रश्न बड़ा उठता है बेटी,कैसे होगी त्राण अब।
कौन करेगा इनको सबला,कौन बनेगा प्राण अब।
हृदय हीन हवसी व्यापारी,बैठे हर बाजार में।
झेल रही हैं दर्द बेटियाँ,गिद्धों के संसार में।
नोच रहे जन स्त्री दामन,धन बल के हथियार से।
मार रहे भीतर का मानव,खुद अपने ही वार से।
शर्मसार करते ये दानव,अपने कुल परिवार को।
शर्मसार करते ये अपनी,माता के संस्कार को।
बेटी,भार्या हीन सभी नृप,बैठे हैं दरबार में।
झेल रही हैं दर्द बेटियाँ,गिद्धों के संसार में।
- रजनीश मिश्र 'दीपक' खुटार शाहजहांपुर उप्र
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