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काव्य : मौन का जहर - अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर



काव्य : 

मौन का जहर

 रेत पर लिखे सपने और मन की अकुलाहट..... 
अजीब सा एक खौफ है जो अब साँसों में उतरने लगा है,
मन का हर कोना जैसे किसी अनकही अकुलाहट से भरने लगा है।
रेत से भरे इस अथाह समुद्र में कुछ विशेष बस्तियों को छाँट दिया गया,
मानो किसी शापित दायरे में हमें खामोश खड़ा कर दिया गया।
समुद्र मंथन की उस पुरानी कथा को आज ज़रा गौर से देखिए,
किसके हिस्से में अमृत आया और किसने हलाहल को सीने से लील लिया?
शिव ने तो संसार बचाने को जहर अपने कंठ में बसाया था,
मगर हमारे हिस्से तो बस योग्यता के कत्ल का सन्नाटा आया था।
माथे पर चिपका दी गई है चुप्पी की एक ऐसी मोहर,
जहाँ चीखना भी गुनाह है और घुट-घुट कर मरना भी मुकद्दर।
' डिग्रियों का बोझ और योग्यता का अपमान'
मैट्रिक की दहलीज़ से लेकर बारहवीं के उन कठिन इम्तिहानों तक,
मनोविज्ञान के पन्नों से लेकर हिंदी लिपि के प्रथम श्रेणी प्रमाण-पत्रों तक,
हमने तो बस अपनी मेहनत और लगन की स्याही से पन्ने रंगे थे,
मगर जब हकीकत का सूरज उगा, तो सारे अरमान बुझे मिले।
गाँव की सुपरवाइजर (आंगनबाड़ी) भर्ती के उस दरवाज़े पर,
जब योग्यता को ताक पर रखकर फैसले लिखे गए एक ही पहर,
तब समझ आया कि कागज़ पर सजी डिग्रियों का कोई मोल नहीं,
जब तक आपका कुल आपकी पहचान का इकलौता बोल नहीं।
एक बारहवीं पास महिला को जब वह हक और सहारा मिला,
तो क्या हमारी प्रथम श्रेणी की योग्यता का सिर्फ किनारा मिला?
 अजीब है, 
माँ के गर्भ की उस पहली नार से तो हर शिशु एक सा ही जन्म लेता है,
माटी, गगन, वायु, जल—सबकी देह को एक जैसा ही जीवन देता है।
भूख की तड़प हो या प्यास की आग, सबका लहू एक रंग बहता है,
फिर क्यों जन्म के इस दायरे पर समाज हमें अलग ही कहता है?
क्या भगवान ने इस कुल विशेष को जन्म देने में कोई खता की थी,
या हमारी रगों में दौड़ती माटी की यह प्यास कोई सज़ा थी?
आज की यह युवा पीढ़ी बड़े संयम और धैर्य से काम लेती है,
अथाह दर्दों की इस सूखी रेत पर बैठकर अपनी रातें गिनती है।
बचपन की कोमलता को किताबों की परछाई में खो देती है,
दिन-रात आँखें फोड़कर जब वह आसमान छूना चाहती है,
तो किसी अदृश्य स्याही से लिखे नियम उसे फिर पीछे धकेल देते हैं।
हैरान हूँ क्योंकि........ 
 प्रभु राम सी निष्ठा और एक सवाल
फिर भी, 
हमें बगावत करना नहीं आता, न ही हुंकार भरना भाता है,
इस भारत की पवित्र माटी से तो हमें प्राणों से भी बढ़कर नाता है।
ठीक वैसे ही, जैसे प्रभु श्रीराम ने सहर्ष वनवास को चुना था,
चुनौतियों के हर एक काँटे को अपने हाथों से बुना था।
राज्य के हर नियम को शिरोधार्य किया, मर्यादा की लाज रखी,
मगर अपने राजा या विधान के खिलाफ कभी एक उंगली न उठी।
हम भी उसी परंपरा के सूरज हैं, जो अनुशासन में जलना जानते हैं,
मगर सवाल यह है कि इस व्यवस्था के तराजू में हम क्यों इतने कम आंकते हैं?
फीस भी पूरी भरो, अंकों की ऊँचाइयों पर भी खुद को साबित करो,
हर शर्त को पूरा करने के बाद भी हर रेस से क्यों बाहर कर दिए जाओ?
 आख़िर हमारी गलती क्या है?
कहा जाता है कि इस आधुनिक भारत में अब कोई भेदभाव नहीं होता,
मगर योग्यता के इस पारदर्शी मैदान में न्याय का सूरज क्यों नहीं उगता?
सवर्ण कुल को कोई विशेष रियायत या भीख नहीं चाहिए,
हमें सिर्फ हमारे पसीने और मेधा का पूरा मोल चाहिए।
श्रेष्ठता और कुंठा की इस छुरी से कब तक हमारी आत्मा को काटा जाएगा?
युवाओं के इस अनकहे और गहरे दर्द को आखिर कौन समझाएगा?
इस दोहरेपन के जाल से छुटकारा पाने के लिए हमें क्या करना होगा?
कोई तो बताए, इस चुपके से पिसते समाज का अंत कब और कैसे होगा?

अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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