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​देवशयनी एकादशी और चातुर्मास : भगवान विष्णु की योगनिद्रा, कमल-पूजन का रहस्य - विजय प्रकाश पारीक स्तंभकार



∆ धर्म - अध्यात्म विशेष

​देवशयनी एकादशी और चातुर्मास : भगवान विष्णु की योगनिद्रा, कमल-पूजन का रहस्य

 - विजय प्रकाश पारीक स्तंभकार

_(प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर)_

​     सनातन परंपरा में *'देवशयनी एकादशी'* केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन, मानव शरीर की जैव-घड़ी (Biological Clock) और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का एक महान संधिकाल है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं और इसके साथ ही 'चातुर्मास' का शुभारंभ होता है।
​लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या भगवान वास्तव में "सोते" हैं? और भगवान श्रीकृष्ण ने इस अवसर पर कमल पुष्प से विष्णु पूजन का विशेष महत्व क्यों बताया?

*​१*. वेदांत का दृष्टिकोण: 'योगनिद्रा' सो जाना नहीं, अंतर-चेतना में प्रवेश है
​वेदांत और उपनिषदों के अनुसार, परमात्मा न कभी सोता है और न ही जागता है। भगवान विष्णु का योगनिद्रा में जाना ईश्वर का विश्राम नहीं, बल्कि सृष्टि के संचालन शक्ति का बाह्य (External) रूप से सिमटकर आंतरिक (Internal) रूप में लीन होना है।
​चातुर्मास के ये चार महीने मनुष्य को संदेश देते हैं कि जब बाह्य वातावरण (मौसम) में उथल-पुथल हो, तब अपनी ऊर्जा को बाहर भटकने देने के बजाय अंतर्मुखी (Inward) कर लेना चाहिए।
​साधना का समय: इस दौरान मांगलिक कार्य (विवाह, मुंडन आदि) इसलिए वर्जित होते हैं ताकि मनुष्य का ध्यान सांसारिक आडंबरों से हटकर 'आत्म-ज्ञान' और चिंतन-मनन की ओर केंद्रित हो सके।

*​२*. श्रीकृष्ण और कमल-पूजन: पद्म (Lotus) चेतना का प्रतीक
​श्रीमद्भागवत एवं पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने एकादशी के महत्व को बताते हुए कहा है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में कमल के फूल का प्रयोग सर्वश्रेष्ठ है।
​कमल का दर्शन: कमल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कीचड़ में खिलता है, पानी में रहता है, फिर भी जल की एक बूंद उस पर नहीं ठहरती। सनातन धर्म में कमल 'अनासक्ति' (Detachment) का सबसे बड़ा प्रतीक है।
​मस्तिष्क की जागृति: योग शास्त्र के अनुसार, मनुष्य की सर्वोच्च चेतना 'सहस्रार चक्र' में निवास करती है, जिसे 'सहस्रदल कमल' (हजार पंखुड़ियों वाला कमल) कहा जाता है। भगवान विष्णु को कमल अर्पित करने का अर्थ अपनी चेतना को सांसारिक विकारों (कीचड़) से ऊपर उठाकर ईश्वर के चरणों में समर्पित करना है।

*​३*. चातुर्मास और मानसूनी चक्र का विज्ञान
​सनातन धर्म का हर नियम प्रकृति और विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित है। चातुर्मास का वैज्ञानिक आधार बेहद सटीक है:
​जैविक चक्र और पाचन शक्ति (Microbiology & Digestion): वर्षा ऋतु में सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है और वातावरण में नमी (Humidity) बढ़ जाती है। इससे हवा और जल में बैक्टीरिया व वायरस तेजी से पनपते हैं। इस मौसम में मनुष्य की जठराग्नि (Digestive Power) मंद हो जाती है। इसलिए चातुर्मास में व्रत, एक भुक्त (दिन में एक बार भोजन) और सात्विक आहार का विधान बनाया गया ताकि शरीर रोगमुक्त रहे।
​जैव-घड़ी (Circadian Rhythm): मानसून में दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं। प्रकृति की इस लय (Rhythm) के साथ शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को सेट करने के लिए योगनिद्रा, ध्यान और नियम-संयम आवश्यक होते हैं।
​पारिस्थितिकी संरक्षण (Eco-system Preservation): चातुर्मास में यात्राएं रोकने का नियम इसलिए था ताकि बारिश के मौसम में सूक्ष्म जीवों और वनस्पति को नुकसान न पहुंचे तथा प्रकृति को स्वतः पुनर्जीवित (Regenerate) होने का समय मिले।

*​४*. आधुनिक संदर्भ में देवशयनी एकादशी का संदेश
​आज के भागदौड़ भरे और डिजिटल युग में चातुर्मास का सिद्धांत और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है:
​डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox): जैसे विष्णु भगवान बाह्य जगत से योगनिद्रा में जाते हैं, वैसे ही आधुनिक मनुष्य को भी कुछ समय के लिए बाहरी सूचनाओं के शोर (Social Media) से हटकर मानसिक शांति (Mindfulness) की योगनिद्रा में जाना चाहिए।
​आत्म-अवलोकन (Self-Reflection): यह चार महीने खुद से यह पूछने का समय है—"क्या हम सांसारिक दौड़ में अपनी मूल चेतना को भूल चुके हैं?"
​संयम ही शक्ति है: चातुर्मास सिखाता है कि जीवन में केवल 'विस्तार' (Expansion) ही सब कुछ नहीं है, कभी-कभी 'ठहराव' (Pause) और संयम ही सबसे बड़ी ऊर्जा का निर्माण करते हैं।
​देवशयनी एकादशी और चातुर्मास केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि शरीर, मन, प्रकृति और परमात्मा को एक लय में लाने का महा-विज्ञान है। भगवान विष्णु की यह योगनिद्रा हमें सिखाती है कि जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए कभी-कभी बाहर की दौड़ रोककर अपने भीतर के 'विष्णु' यानी अपनी आत्मा को जगाना आवश्यक है।
सबका कल्याण करो प्रभु आपकी जय हो।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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