लघुकथा :
पशुओं की शिक्षा व्यवस्था
जंगल के राजा शेर ने फैशन-जगत की चतुर लोमड़ी को बुलाकर आदेश दिया—
“जंगल में स्मार्ट शिक्षा लागू करनी है। पशु कुछ-कुछ इंसानों जैसे होने लगे हैं। उन्हें फिर से पशुता का पाठ पढ़ाना होगा… लेकिन पाठ्यक्रम इंसानों जैसा ही दिखना चाहिए।”
लोमड़ी ने योग्य और बुद्धिमान पशुओं को शिक्षण संस्थानों का दायित्व सौंप दिया।
कुछ समय बाद शेर को सूचना मिली—“महाराज! शिक्षा का असर उल्टा हो रहा है। पशुओं में दया, सहयोग और इंसानियत के गुण विकसित होने लगे हैं। प्रहरी भी नागरिकों से मानवीय व्यवहार करने लगे हैं।”
शेर का माथा ठनक गया। उसने लोमड़ी को हटाकर एक मोटे, निर्दयी भेड़िए को शिक्षा-प्रधान बना दिया।
नए शिक्षा-प्रधान ने गिद्धों को कुलपति और कौओं को रजिस्ट्रार नियुक्त कर दिया। देखते ही देखते संस्थानों में ज्ञान की जगह भय, शोध की जगह शिकार और शिक्षा की जगह सौदेबाज़ी का बोलबाला हो गया। परीक्षाओं में घोटाले होने लगे, प्रश्नपत्र बिकने लगे। गिद्ध और कौए दिन-दूनी, रात-चौगुनी संख्या में बढ़ने लगे।
त्रस्त खरगोश, हिरण और अन्य निरीह पशु न्याय की गुहार लेकर शेर की गुफा पर पहुँच गए।
आराम में व्यवधान पड़ने से शेर दहाड़ा—“व्यवस्था-विरोधियों को हटाओ! हमारी शांति भंग करने वालों को बख्शा न जाए।”
भेड़िए भीड़ पर टूट पड़े। कई खरगोश और हिरण वहीं ढेर हो गए। बाकी जान बचाकर जंगल छोड़ गए।
अगले दिन राजाज्ञा जारी हुई—
“जंगल की शिक्षा-व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधारों के लिए शिक्षा-प्रधान को ‘शिक्षा सम्मान’ प्रदान किया जाता है।”
पत्रकार कबूतरों ने पूछा, “भीड़ पर हुए हमले की जाँच होगी?”
राज्य के वरिष्ठ भालू ने मुस्कराकर कहा, “मामला बिल्कुल साफ़ है। हमला भेड़ियों पर हुआ था। उन्होंने आत्मरक्षा में केवल हाथ-पैर चलाए। दुर्भाग्य से कुछ पशु मर गए, कुछ घायल हुए और बाकी भाग निकले। निश्चिंत नींद राजा का विशेषाधिकार है; उसमें बाधा डालने वालों के साथ यही होगा।”
राजा की सत्ता अक्षुण्ण रही।
रात भर चमगादड़ चीखते रहे।
गिद्धों और कौओं की जय-जयकार होती रही।
मासूम पशु अब अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं, क्योंकि जंगल में लोकतंत्र ज़िंदा है अभी।
- सुरेश पटवा , भोपाल
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कथा कहानी
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