काव्य :
मेरी अंतिम यात्रा
सच कहता हूं एक दिन, मैं बहुत ही डर गया,
काम बचे थे बहुत पर, अचानक मैं मर गया।
रोती पत्नी, बेटा मायूस, जड़ हो गई थी बेटी भी।
पूरे घर पर मानो, छा गई एक बेबसी थी।
रोना धोना खूब हुआ, मचा था घर में कोहराम,
मृत्यु शैय्या में लेटा मैं, देख रहा था हाल तमाम।
बेटा है पढ़ रहा, बेटी की भी करनी है शादी,
थोड़ा रुक जाता, क्या थी जाने की इतनी जल्दी।
जितने थे मुंह वहां, हो रही थी उतनी ही बातें,
कोई मना रहा था शोक, कोई दे रहा था लानतें।
इसकी उसकी सब की बातें, सुनने की थी लाचारी।
मैं तो देख रहा था अपनी, अंतिम यात्रा की तैयारी।
अजी सुनते हो, कानों में गूंजी एक कर्कश बोली।
चौंक पड़ा मैं उठ बैठा, धीरे से अपनी आंखें खोली।
चारों ओर घूमी नजरें, सब कुछ यहां अपना था।
हां, अंतिम यात्रा का, यह तो बस एक सपना था।
- प्रमोद सामंतराय
सरायपाली महासमुंद (छ.ग.)
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