‘दिमागी नक्सल’ : एक शब्द के बहाने
— विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
भाषा समय के साथ बढ़ती है। समाज में नई परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं तो उनके लिए नए शब्द भी बनते हैं। कभी दो पुराने शब्द मिलकर नया अर्थ रचते हैं, कभी राजनीति किसी प्रवृत्ति को पहचान देने के लिए कोई नया मुहावरा गढ़ लेती है। ‘दिमागी नक्सल’ भी ऐसा ही शब्द है, ‘दिमाग’ और ‘नक्सल’ का एक असामान्य मेल।
मोटे तौर पर इसका इस्तेमाल उन लोगों या प्रवृत्तियों के लिए किया जाता है, जिन पर नक्सली अथवा माओवादी विचारधारा के वैचारिक समर्थन या प्रभाव का आरोप लगाया जाता है। इस आशंका को पूरी तरह निराधार कह देना भी उचित नहीं होगा। हिंसक उग्रवाद केवल बंदूक से नहीं, विचार और प्रचार के माध्यम से भी अपना प्रभाव बढ़ा सकता है। यदि कोई व्यक्ति हिंसा को परिवर्तन का वैध साधन मानता है या हिंसक उग्रवाद को वैचारिक समर्थन देता है, तो उसकी आलोचना आवश्यक है।
लेकिन यहीं दूसरी सावधानी भी उतनी ही जरूरी है, हर आलोचक उग्रवादी नहीं होता और हर असहमति नक्सलवाद नहीं।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना, नीतियों की आलोचना करना, व्यवस्था की कमियाँ बताना, व्यंग्य लिखना या किसी स्थापित विचार पर पुनर्विचार का आग्रह करना नागरिक और रचनाकार दोनों का अधिकार है। किसी लेखक, व्यंग्यकार या समालोचक ने सत्ता अथवा व्यवस्था की आलोचना की, इसलिए उसे ‘दिमागी नक्सल’ कह देना उतना ही सरलीकरण है, जितना हिंसक विचारधारा के वास्तविक समर्थन को केवल ‘असहमति’ या अभिव्यक्ति की आजादी ,कहकर टाल देना।
कसौटी व्यक्ति का लेबल नहीं, उसके विचार और आचरण होने चाहिए।व्यंग्यकार का काम ही असुविधाजनक सवाल पूछना है। समालोचक का काम सदा प्रशंसा-पत्र बाँटना नहीं, रचना की कमजोरियों और उसके अंतर्विरोधों को सामने लाना है। लेखक का काम चुटकारिता के साथ हमेशा प्रसन्न करना भी नहीं। यदि हर तीखे व्यंग्य को विद्रोह, हर आलोचना को षड्यंत्र और हर असहमति को ‘दिमागी नक्सल’ कह दिया जाए, तो सार्वजनिक संवाद जल्दी ही विचारों से खाली होकर विशेषणों से भर जाएगा।
लेकिन दूसरी तरफ साहित्यिक स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं कि रचनाकार अपने विचारों को आलोचना से परे मान ले। यदि किसी लेखन, भाषण या गतिविधि में वास्तव में हिंसा का समर्थन, लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसक ढंग से उखाड़ फेंकने का आग्रह या प्रतिबंधित हिंसक संगठनों के प्रति सक्रिय वैचारिक समर्थन दिखाई देता है, तो उसकी पहचान और आलोचना भी आवश्यक है। उसे केवल लोकतांत्रिक ‘लेखकीय स्वतंत्रता’ कहकर अनदेखा करना उचित नहीं।
मुश्किल शब्द में नहीं, शब्द के प्रमाणहीन इस्तेमाल में है।आज हमारी एक आदत बढ़ती जा रही है, तर्क सुनने से पहले वक्ता का खेमाबोध तय कर लेना। अपने आदमी की कमजोरी भी विचार लगती है और विरोधी की श्रेष्ठ बात भी षड्यंत्र। यही मानसिकता लेबलों को जन्म देती है। एक शब्द बोलिए और बहस समाप्त, ‘दिमागी नक्सल’, ‘देशद्रोही’, ‘अंधभक्त’, ‘कट्टर’, ‘शहरी नक्सल’… शब्द बदलते रहते हैं, सुविधा वही रहती है। इसके समानांतर विपक्ष भी ढेरों शब्द गढ़े बैठा है ।
लेबल लगाना आसान है, तर्क का उत्तर देना कठिन होता है।
इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ पर असली बहस शायद यह नहीं कि यह शब्द किसने बनाया या किस पर लगाया गया। असली सवाल यह है कि क्या आरोप प्रमाण पर आधारित है? क्या असहमति और हिंसक उग्रवाद के बीच फर्क किया जा रहा है? क्या हम अपने पक्ष और विरोधी पक्ष के लिए एक ही कसौटी रखते हैं?
लोकतंत्र की शक्ति इस बात में है कि वह असहमति को जगह देता है, लेकिन हिंसा को वैधता नहीं देता। वह प्रश्न सुनता है, पर हिंसा के औचित्य को स्वीकार नहीं करता। वह आलोचक की स्वतंत्रता बचाता है और साथ ही हिंसक उग्रवाद के खतरे को पहचानता है।
दिमाग में विचारों का जंगल होना बुरा नहीं। जंगल में प्रश्न भी हैं, स्मृतियाँ भी, पूर्वाग्रह भी और रास्ते भी। विचार का काम उस जंगल में रास्ता खोजना है। लेकिन यदि कोई विचार हिंसा को ही रास्ता घोषित कर दे, तो वहाँ प्रश्न और प्रतिरोध दोनों जरूरी हैं।
इसलिए किसी व्यंग्यकार, समालोचक या लेखक को केवल उसकी तीखी भाषा के कारण ‘दिमागी नक्सल’ कहना अनुचित है, और किसी वास्तविक वैचारिक समर्थन को केवल साहित्यिक स्वतंत्रता की ओट में छिपा देना भी अनुचित है।
शब्द से पहले संदर्भ देखिए, आरोप से पहले प्रमाण और असहमति से पहले संवाद जरूरी है। राजनीतिक शब्दावली बदलती रहेगी। आज ‘दिमागी नक्सल’ है, कल कोई दूसरा लेबल होगा। साहित्य और लोकतंत्र की जिम्मेदारी मगर वही रहेगी, विचार का उत्तर विचार से, हिंसा का प्रतिरोध स्पष्टता से और आरोप का आधार प्रमाण से।क्योंकि हर असहमति विद्रोह नहीं होती, लेकिन हर हिंसक विचार को असहमति कह देना भी लोकतंत्र की यात्रा नहीं होती।
— विवेक रंजन श्रीवास्तव
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