लघुकथा :
जिंदा है अभी
पार्क की बेंच पर बैठा मैं चुपचाप देख रहा था,
सामने एक वृद्ध दंपती मौन-सा बैठा था।
पत्नी धीमे स्वर में अपना दुख सुना रही थी,
आँखों से चुपचाप पीड़ा बहा रही थी।
पति ने उसके काँपते हाथों पर अपना हाथ रखा—
"घबराओ मत, मैं बेटों से बात करूँगा।
जितनी साँसें हैं, उतने दिन साथ रहेंगे,
एक ही छत तले जीवन के पल जिएँगे।
खुदा जब जुदा करेगा, तब की बात और होगी...
ज़िंदा हैं अभी, तो बिछड़ें क्यों?"
- डॉ अंजना गर्ग
सेवानिवृत महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय
रोहतक
Tags:
कथा कहानी
.jpg)