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जीवन -पथ - अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर


जीवन -पथ

"बदलाव आसमान से नहीं उतरता, वह तो रसोई की देहरी से मां के कोख से और अतंस की जिद्द से शुरू होता है! "

   हमारे लिए कागज़ और कलम केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि साक्षात देवता हैं—तभी तो चित्रगुप्त जी हमारे आराध्य हैं और हम उनके वंशज। आज जो वेदना मेरे अतंस (हृदय) में बरसों से अटकी हुई थी, उसे साझा कर रही हूँ। हालांकि, अब इस थाती (विरासत) को अपनी बेटी के हाथों में आगे बढ़ते हुए देखती हूँ, तो एक अजीब सा सुकून मिलता है।
मेरी शादी के ठीक अगले दिन मेरा मनोविज्ञान का आखिरी पेपर था। इस वजह से मेरी विदाई कुछ वक़्त के लिए टल गई, जिस पर वर पक्ष के साथ कुछ खींचतान भी हुई। आखिरकार पेपर देने के बाद ही मेरी विदाई हो पाई। मेरी सासू जी खुद एक शिक्षिका थीं, फिर भी मेरा नसीब तो देखिये—विश्वविद्यालय में बेहतरीन अंक प्राप्त करने के बाद भी मेरी पढ़ाई रोक दी गई, सिर्फ इसलिए कि अब मैं एक बहू बन चुकी थी।
मन में हमेशा इस बात की कसक और गहरी शिकायत रही। लेकिन मैंने मौन के समझौते को अपनी हार या समर्पण नहीं समझा, बल्कि वहीं से एक लेखिका का जन्म हुआ। पहले मैं डायरी में अपने मन के भाव उकेरा करती थी, और फिर धीरे-धीरे आप सबके सामने कलम के जरिए अपनी बात रखने लगी।
हमारे गाँवों की माटी में जहाँ एक ओर परंपराओं की सोंधी खुशबू है, वहीं उन पंखुड़ियों के नीचे दबे कुछ कड़े कांटे भी हैं। हर कायस्थ परिवार की तरह हमारे यहाँ भी चित्रगुप्त पूजा का दिन बहुत खास होता है। भाई-बहनों के स्नेह का पर्व—भैया दूज और चित्रगुप्त पूजा एक ही दिन आते हैं। पर हमारे मायके के समाज में एक दस्तूर बरसों से पत्थर की लकीर बना हुआ था कि चित्रगुप्त पूजा में स्त्रियों का बैठना और पूजन करना पूरी तरह वर्जित है।
जब घर के पुरुष धोती-कुर्ते में सजे, कलम-दवात की पूजा करते थे, तब हम बहनें और माँ चौखट के उस पार बैठकर गोधन कूटती थीं और भैया दूज के गीत गाकर अपनी रस्म निभाती थीं। मन के किसी कोने में हमेशा यह कसक रहती थी कि जिनके हाथों में घर की धुरी है, जो हर रूप में संभालती हैं, उन्हें ही विद्या और न्याय के देवता के दरबार से बाहर क्यों रखा जाता है?
शायद इसी कसक को भगवान ने सुन लिया था। तीन भाइयों के बाद जब पापा को बेटी की तीव्र इच्छा हुई, तो वे झोली फैलाकर बाबा बैद्यनाथ की नगरी पहुँचे। देवघर के त्रीकुटी पर्वत पर जाकर उन्होंने मन्नत माँगी और वहाँ के पुजारी बाबा ने आशीर्वाद दिया कि—“तुम्हें बेटियाँ होने का परम सौभाग्य प्राप्त होगा।” सचमुच, वक्त के साथ हम चारों बहनों ने पिता के आँगन में जन्म लिया और हमारे पिता ने हमारा लालन-पालन कभी बेटों से कम नहीं होने दिया।
जब माँ ब्याह कर इस दुनिया में आई थीं, तो उन्होंने अपने मायके और ससुराल दोनों जगह यही देखा कि घर की बेटियाँ या बहुएँ कभी चित्रगुप्त पूजा का हिस्सा नहीं बनतीं। पर माँ का दिल बागी था। उन्होंने चुपचाप एक नई शुरुआत की और हम चारों बहनों को कलम और दवात के साथ उस पूजा की पटरी के पास बैठाना शुरू किया। वहीं से हमारे मन में यह बीज पड़ा कि ज्ञान और कलम पर किसी एक लिंग का एकाधिकार नहीं है।
वक्त अपनी चाल चलता रहा। हम चारों बहनें बड़ी हुईं और चार अलग-अलग दिशाओं में अपनी गृहस्थी बसाने चली गईं। मेरी शादी एक ठेठ ग्रामीण परिवेश वाले घर में हुई। जब इस नई दुनिया में पाँव रखे, तो यहाँ की पुरानी दीवारों ने मेरा स्वागत कुछ यूँ किया कि मुझे अपनी जड़ें हिलती महसूस हुईं। यहाँ आने पर पता चला कि—“लड़कियों का तो छठियार भी नहीं होता!”
जब मेरी पहली बेटी इस संसार में आई, तो सासू माता ने बड़े सहज भाव से कह दिया, "बहू, हमारे यहाँ लड़कियों का छठियार नहीं मनाया जाता।"
मैंने अपनी दोनों ननदों की ओर देखा—उनका छठियार भी उनकी शादी के दिन ही हुआ था! यह बात मेरे सीने में तीर की तरह चुभी। आखिर एक नवजात शिशु, चाहे वह बेटी हो या बेटा, इस धरती पर आया है तो उसके स्वागत में ढोलक क्यों न बजे? खुशियाँ लिंग देखकर थोड़ी आती हैं!
मैंने अपनी सासू माँ को बहुत मनाया, ससुर जी के आगे हाथ जोड़े और उन्हें विश्वास दिलाया कि कोई ढिंढोरा नहीं पीटना है, बस साधारण रीति से घर के भीतर ही यह रस्म होगी। आखिर बुजुर्गों का दिल पिघला, सहमति मिली और घर की चारदीवारी के भीतर मेरी बिटिया का पहला छठियार हुआ। मैंने राहत की साँस ली—चलो, एक दीवार तो गिरी!
पर रूढ़ियों के किले एक झटके में थोड़े ही ढहते हैं! कुछ साल बीते और फिर वही पुरानी दीवार सामने आ गई—चित्रगुप्त पूजा में स्त्रियों का बैठना मना है।
इस बार मैंने चुपचाप अपनी बेटी के नन्हें हाथों में कलम और दवात थमा दी। उसे सिखाया कि यह कलम तुम्हारी सबसे ताकतवर पहचान है। वह नन्हीं सी बच्ची बड़ी हुई, उसने दिन-रात मेहनत की और आज जब उसका दाखिला गोरखपुर के एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ इंजीनियरिंग सरकारी कॉलेज में हुआ, तो एक माँ के रूप में मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया। आज बिटिया को एक वरिष्ठ इंजीनियरिंग सरकारी कॉलेज में जाते हुए देखकर ऐसा लगा जैसे मानो पुनः मैंने अपना जीवन जी लिया हो।
उस दिन मैंने मन में ठान लिया कि अब और नहीं। मैंने अपनी बेटी का हाथ पकड़ा और उसे सीधे जाकर पूजा की उस वेदी पर बैठा दिया, जहाँ सदियों से सिर्फ पुरुषों के बैठने का नियम बना दिया गया था। आज मेरी बेटी ने वहीं बैठकर कलम-दवात की पूजा की। यह देखकर मेरी आँखें नम हो गईं, लेकिन मन में एक गहरा सवाल आज भी गूँजता है—
माना कि अपनों से बगावत के रास्ते में केवल कड़वाहट ही मिलती है, फिर भी... अगर सोच, नियत और नियति साफ हो, तो आने वाली पीढ़ी के लिए पीड़ा का यह सफर काफी हद तक कम हो जाता है।
समाज की बनाई इन दीवारों को कोई बाहर वाला आकर नहीं तोड़ेगा। इसकी शुरुआत सबसे पहले हमीं जैसी माताओं को खुद से करनी होगी। अगर एक माँ अपने घर से यह बगावत शुरू नहीं करेगी, तो हमारी बेटियाँ हमेशा चौखट के उस पार बैठकर सिर्फ गोधन ही कूटती रह जाएंगी। 

 - अभिलाषा श्रीवास्तव,
 गोरखपुर
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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