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जिस आजादी में संस्कार नहीं, वह स्वच्छंदता है - आर्यिका भावनामति


जिस आजादी में संस्कार नहीं, वह स्वच्छंदता है - आर्यिका भावनामति 

इटारसी। युवा होना केवल उम्र की पहचान नहीं, बल्कि ऊर्जा, उत्साह, बड़े सपनों और मजबूत संकल्प की पहचान है। जब युवा शक्ति सही दिशा में आगे बढ़ती है तो समाज और राष्ट्र का निर्माण करती है, लेकिन यही शक्ति गलत दिशा में चली जाए तो विनाश का कारण भी बन सकती है। युवा शक्ति यदि धर्म, संस्कार और संयम से जुड़ जाए तो वह पूरे समाज को बदलने की क्षमता रखती है।

यह उद्गार जैन आर्यिका संघ प्रमुख भावनामति ने महावीर भवन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा, युवाओं को आजादी चाहिए और आजादी मिलनी भी चाहिए, लेकिन यह समझना जरूरी है कि जिस आजादी में संस्कार नहीं, वह स्वच्छंदता है और जिस आजादी में संयम है, वही सच्ची स्वतंत्रता है।

युवाओं को प्रेरित करने वाली एक कहानी है। दो युवक एक रास्ते से जा रहे थे। रास्ते में एक बड़ा पत्थर पड़ा था। पहले युवक ने पत्थर को देखकर कहा, “रास्ता ही खराब है, मेरी किस्मत ही खराब है। मेरे सामने यह पत्थर क्यों आया?” वह वहीं बैठकर अपनी किस्मत को कोसने लगा।

दूसरे युवक ने पत्थर को देखा और मुस्कराकर कहा, “पत्थर मेरे रास्ते में आया है, मेरी मंजिल में नहीं।” उसने पत्थर हटाने का संकल्प लिया। मेहनत की, पसीना बहाया और आखिरकार पत्थर को रास्ते से हटा दिया। पत्थर के नीचे एक पोटली मिली। उसमें धन नहीं, बल्कि एक संदेश था—“जो व्यक्ति रास्ते की बाधा को हटाने का संकल्प करता है, वही जीवन की असली संपत्ति पाता है।”

आर्यिका भावनामति ने समझाया, आज युवाओं के जीवन में भी ऐसे अनेक पत्थर हैं। किसी के सामने मोबाइल का पत्थर है, किसी के सामने आलस्य का, किसी के सामने गलत संगति का, किसी के सामने क्रोध और नशे का। किसी के सामने हीन भावना का पत्थर है कि “मैं क्या कर सकता हूं?”

जरूरत इस बात की है कि युवा तय करें—वे जीवन के इन पत्थरों को हटाएंगे या उनके सामने बैठकर रोते रहेंगे। आलस्य है तो उसे हटाना होगा। क्रोध है तो उस पर नियंत्रण करना होगा। बुरी संगति है तो उससे दूरी बनानी होगी और मोबाइल का उपयोग करना है तो उसे जीवन पर हावी नहीं होने देना होगा।

जीवन में असफलता आए तो उसे अंत न समझें। असफलता दीवार नहीं, अगली सफलता की सीढ़ी है। आज युवा मोबाइल की स्क्रीन पर घंटों दूसरों की जिंदगी देखते रहते हैं—किसी की गाड़ी, किसी का घर और किसी की सफलता। दूसरों की जिंदगी देखने में समय गंवाने के बजाय अपनी जिंदगी बनाने में समय लगाना चाहिए।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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