बुजुर्गों का अनुभव और नई पीढ़ी: संवाद से समन्वय तक
- डाॅ.राकेश सक्सेना , एटा
बुजुर्ग परिवार और समाज की रीढ़ होते हैं। हमारे जीवन की व्यवस्था इनके इर्द-गिर्द घूमती है। संस्कार, भाषा, खेती, शादी, झगड़ों का समाधान सभी में ये मार्गदर्शक होते हैं, इसलिए बुजुर्गों को अनुभव का खजाना एवं कुल का जीवित इतिहास कहा जाता है। चार आश्रमों की अवधारणा में वानप्रस्थ और सन्यास बुजुर्गों के लिए ही है। ' मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्य देवो भव ' इसी सोच से भारतीय संस्कृति में समाहित है। बताया गया है कि दस उपाध्यायों से एक आचार्य बड़ा है, सौ आचार्यों से एक पिता बड़ा है और एक हजार पिताओं से भी माता गौरव में बड़ी होती है। माता-पिता सर्वोच्च हैं, अनुभव, संस्कार और आशीर्वाद के प्रतीक हैं। परिवार व समाज में इनकी सेवा करना केवल कर्तव्य नहीं अपितु अपने ही जीवन को आयु, ज्ञान और यश से भरने का रास्ता है, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी परिवर्तन, तकनीक, नवीन विचारों और भविष्य की सम्भावनाओं की वाहक है। इन दोनों के बीच यदि संवाद बना रहे तो अनुभव और नवाचार का सुन्दर समन्वय सम्भव है। वर्तमान समय में पारिवारिक विघटन, शहरीकरण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की महत्वाकांक्षा ने दोनों ही पीढ़ियों के सम्बन्धों को चुनौती दी है। बुजुर्गों को लगता है कि नई पीढ़ी परम्पराओं और पारिवारिक मूल्यों से विमुख होती जा रही है और युवा पीढ़ी वर्तमान परिस्थितियों के लिए बुजुर्गों को अनुपयुक्त मान रहे हैं।
पीढ़ी अंतराल की इस अवधारणा में दोनों के सोच, अनुभव, भाषा, तकनीकी व्यवहार, सामाजिक प्राथमिकताओं और जीवन-मूल्यों का अंतर है, जो तनाव को जन्म दे रहा है। संवाद के अभाव में एक घर में रहते हुए दोनों ही समस्याएँ साझा करने से बचते हैं। बच्चे समझते हैं कि उपदेश मिलेगा तो वहीं पर बुजुर्ग अपने को उपेक्षित अनुभव करते हैं। अक्सर यह धारणा बना दी जाती है कि परम्परा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी हैं लेकिन इन दोनों को समन्वित किया जा सकता है। बुजुर्ग अपने अनुभव से बता सकते हैं कि क्या मूल्यवान है और नई पीढ़ी यह बता सकती है कि इसे नये संदर्भ में कैसे अपनाया जाए? इसी प्रकार डिजिटल तकनीक भी संवाद का सेतु बन सकती है। युवा स्मार्टफोन,ऑनलाइन सेवाओं की जानकारी बुज़ुर्गों को दे सकते हैं और बुज़ुर्ग भी युवाओं को धैर्य से परिवार का इतिहास, संस्कृति व जीवन के अनुभवों से परिचित करा सकते हैं। परिवार में सामूहिक गतिविधियाँ, सहभोज, संस्मरण सुनने की परम्परा, पुराने फोटो का संरक्षण, बुज़ुर्गों का परामर्श, संवाद व संवेदनशीलता को विकसित कर सकता है।
आधुनिक परिवारों में आज बुज़ुर्गों की भूमिका बदल रही है। पहले वे परिवार के निर्णायक होते थे लेकिन आजकल वे अधिकार-आधारित सम्बन्धों से सहभागिता आधारित सम्बन्धों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। नई पीढ़ी का भी उत्तरदायित्व है कि बुज़ुर्गों को समय दें , इनकी बात धैर्य से सुनें, इनको डिजिटल दुनिया से जोड़ें, इनकी सामाजिक उपयोगिता को पहचानें, असहमति को अपमान में न बदलें। कहने का तात्पर्य है कि पीढ़ियों के बीच समन्वय के लिए किसी एक पक्ष को पूरी तरह बदलने के बजाय दोनों पक्षों में लचीलापन आवश्यक है। सुनना संवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरे की बात पूरी होने से पूर्व निष्कर्ष निकालना संवाद को कमजोर करता है। युवाओं को बुज़ुर्गों के अनुभव का सम्मान करना चाहिए और बुज़ुर्गों को युवाओं के स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहाँ युवा अपनी असहमति व्यक्त कर सकें और बुजुर्ग अपनी भावनाएँ नि:संकोच साझा कर सकें। इसके अतिरिक्त अंतर पीढ़ी संवाद में विद्यालय-महाविद्यालय, समाज और सामुदायिक, स्वयंसेवी संस्थाएँ, सांस्कृतिक मंच आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अंतर पीढ़ी में संवाद का सामाजिक महत्व होता है। जब बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा एक साथ आएगी तो निश्चित ही सकारात्मक परिणाम आएँगे। यह नहीं भूलना चाहिए कि नई पीढ़ी भी भविष्य की बुजुर्ग पीढ़ी है। वह भी उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचेगा, जहाँ अनुभव तो होगा लेकिन सामाजिक गति शायद आगे निकल चुकी होगी अत: इस बात को ध्यान में रखना होगा कि जिस समाज में वृद्धावस्था को सम्मान व सहभागिता मिलेगी वहाँ भविष्य में वृद्ध होना भय या सामाजिक बहिष्कार का पर्याय नहीं बनेगा। बुजुर्गों को सम्मान देने व साझेदार बनाने की आज आवश्यकता है। बुजुर्गों का अनुभव,युवाओं का नवाचार जब संवाद के माध्यम से मिलते हैं तब पीढ़ी अंतराल संघर्ष नहीं, सामाजिक समन्वय की शक्ति बन जाता है। संवाद से समझ पैदा होती है, समझ से सम्मान, सम्मान से सहभागिता और सहभागिता से सदैव ही समन्वय स्थापित होता है। यही वह मार्ग है जिसके माध्यम से परिवार को अधिक संवेदनशील, समाज को समावेशी और भविष्य को मानवीय बनाया जा सकता है।
- डाॅ. राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
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