लघु कथा :
रविवार किसका था?
“माँ, आज तो संडे है... आप आराम क्यों नहीं कर रहीं?” बेटी ने पूछा।
माँ कपड़े समेटते हुए मुस्कुराईं, “बस ये रख दूँ, फिर बैठती हूँ।”
सोफे पर बैठे पति ने आवाज़ दी, “चाय मिलेगी?”
माँ रसोई की ओर बढ़ीं ही थीं कि बेटी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“आप बैठो माँ... चाय पापा बना लेंगे।”
पति ने एक पल नज़र उठाई, फिर मोबाइल पर उँगलियाँ चलाने लगे।
माँ ने धीमे स्वर में कहा, “दादी की दवा खत्म हो रही है, तुम्हारी स्कूल की चीज़ें देखनी हैं, laundry पड़ी है, मौसम बदल रहा है तो कपड़े भी रखने हैं...”
पति बोले, “अरे, तुम बता दिया करो न, क्या करना है।”
माँ कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर बोलीं, “यही तो थका देता है... हर चीज़ मुझे ही क्यों दिखाई दे, मुझे ही क्यों याद रहे, और फिर मैं ही सबको बताऊँ?”
बेटी ने माँ को अपने पास बैठा लिया।
पति अभी भी मोबाइल स्क्रॉल कर रहे थे।
कमरे में कुछ देर खामोशी रही।
मेज़ पर कपड़ों का ढेर अब भी वैसे ही पड़ा था।
--डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
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कथा कहानी
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