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व्यंग्य : बिन माइक, सब सून - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल

 



व्यंग्य : 

बिन माइक, सब सून      

 -देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल

  आजकल किसी भी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक कार्यक्रम में सबसे आवश्यक वस्तु यदि कोई है, तो वह माइक ही है । धार्मिक कार्यक्रमों में पहले यजमान और पंडित जी पूजा हेतु अभिषेक सामग्री, फल-फूल, और दक्षिणा को अनिवार्य मानते थे । आजकल भले ही इन सामग्रियों में कटौती हो जाए-और यदि कोई सामग्री न भी हो, तो विद्वानों ने उसका विकल्प ढूंढ लिया है-लेकिन बिना माइक के भक्ति संभव नहीं लगती, क्योंकि माइक का कोई विकल्प ही नहीं है । यदि माइक उपलब्ध हो जाए और बिजली न हो, तब भी कार्यक्रम फीका पड़ जाता है । लोग भी ऐसे आयोजनों में तभी भाग लेते हैं जब माइक और बिजली दोनों उपलब्ध हों । इसी तरह किसी सांस्कृतिक, सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम में भी श्रोताओं को माइक के माध्यम से ही बाँधा जाता है । यदि भीड़ अधिक हो और वक्ता की आवाज दूर तक न पहुँच रही हो, तो माइक का उपयोग पूरी तरह उचित है । लेकिन कभी-कभी देखा जाता है कि जहाँ केवल दो-चार व्यक्ति ही बैठे होते हैं, वहाँ भी ध्वनि विस्तारक यंत्र (लाउडस्पीकर) से कानों को फाड़ने वाली ध्वनि गूँजती रहती है । पता नहीं इन ध्वनि विस्तारक यंत्रों को ध्वनि प्रदूषण के नियमों से बाहर क्यों रखा गया है ? इस संदर्भ में विज्ञान कहता है कि 70 डेसिबल (dB) तक की ध्वनि पूरी तरह सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन 85 डेसिबल से अधिक की ध्वनि कानों को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है।विज्ञान के अनुसार, स्पष्ट प्रतिध्वनि (Echo) सुनने के लिए वक्ता और अवरोध के बीच कम से कम 17 मीटर की दूरी होनी चाहिए । अन्यथा, यदि पास से ही 85 डेसिबल से अधिक की तीव्र ध्वनि सुनी जा रही हो, तो उससे मानसिक तनाव, विक्षिप्तता और मस्तिष्क रोग जैसी गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं । इससे धीरे-धीरे सुनने की क्षमता भी कम होने लगती है । वैसे, दूसरों की बात न सुनने की क्षमता का विकसित होना अब एक तरह से अच्छी बात माना जाने लगा है, क्योंकि आजकल समाज में कोई किसी की सुनता ही नहीं है । आमतौर पर देखा गया है कि बेटा पिता की नहीं सुनना चाहता, पत्नी पति की नहीं सुनना चाहती और पड़ोसी एक-दूसरे की बातों को अनसुना कर देते हैं । खैर, ये तो वे लोग हैं जो आसपास ही रहते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर भी यह देखा गया है कि मुख्य वक्ता के अलावा कार्यक्रम में जितने अन्य वक्ता बैठे रहते हैं, वे भी एक-दूसरे के भाषण अनसुनी करते दिखाई देते हैं । कोई भी धार्मिक वक्ता किसी दूसरे की कथा या प्रवचन सुनने के लिए बैठना ही नहीं चाहता । यही स्थिति आज के साहित्यकारों की भी है । दूसरों की बात न सुनने के कारण सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि लोगों की सोच 'कुएँ के मेंढक' (कूपमंडूक) जैसी संकुचित होती जा रही है । जबकि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में श्रवण (सुनने) के महत्व के संबंध में कहा है:-
"सुनि समझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग ।
      लहहिं चारि फल अछत  तनु  साधु  समाज प्रयाग ॥"
    अर्थात जो लोग ध्यान से सुनकर बात को समझते हैं, वे आनंदित होते हैं और इसके फलस्वरूप जीवन के चारों फलों-अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष-को प्राप्त कर लेते हैं । लेकिन जब कोई सुनेगा ही नहीं, तो उसे क्या प्राप्त होगा ? "किंतु ऐसे लोगों को भी सुनाने का चस्का इतना अधिक हो गया है कि इसके आगे वे चारों फलों की कामना भी त्याग देते हैं ।" अब तो शासन और प्रशासन के स्तर पर भी न सुनने की आदत के कारण आम लोगों की शिकायतों का समय पर निराकरण नहीं हो पाता है । इसीलिए पूरे महीने में केवल एक या दो दिन ही 'जनसुनवाई' का कार्यक्रम रखा जाता है । यहाँ भी लोगों की समस्याएँ कम सुनी जाती हैं और लोगों को भाषण ज़्यादा सुनाए जाते हैं ।"असल में, प्रशासन में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की सुनने की क्षमता और इच्छा बहुत कम हो गई है, यदि यह सब देख-सुनकर कहा जाए कि सत्ता के भी कान नहीं होते हैं, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । इस संदर्भ में एक दोहा बड़ा प्रसिद्ध है-'विधना यह जिय जानिके, शेषहि दिए न कान धरा मेरु सब डोलिहें , तानसेन की तान ।' अर्थात, शेषनाग के कान नहीं होने का वर्णन आया है; क्योंकि यदि उनके कान होते, तो तानसेन की तान सुनकर धरती और पर्वत सब डोलने लगते । असल में, इस दोहे का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि 'हे पृथ्वीवासियों ! तुम्हारा शोर बहुत अधिक है । और ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी को भी शेषनाग सिर पर धारण किये हुये है यदि उनके कान होते तो वे भी तुम्हारी ध्वनि प्रदूषण से परेशान हो जाते । अतः शेषनाग के कान नहीं होना अच्छा ही है।'" हम ध्वनि प्रदूषण और इसके दुष्प्रभावों को गहराई से समझे तभी हम इसके दुष्प्रभावों से बच सकते हैं । कभी-कभी तो किसी समारोह में ध्वनि विस्तारक यंत्र की तेज ध्वनि से कुछ सुनाई ही नहीं देता कि कोई व्यक्ति आ रिया  है कि जा रिया  है । इसका पता तो आते जाते हाथ जोड़े हुये लोगो के हाव-भाव से ही चलता क्योकिं शोर में कुछ सुनाई देना संभव ही नहीं होता है । यदि हम आवश्यकता पड़ने पर ही माइक का सीमित उपयोग करें, तो वह ठीक है । जैसे 'ऊपर वाला' (ईश्वर) भी किसी विशेष परिस्थितियों में ही आकाशवाणी के माध्यम से पृथ्वीवासियों को "सावधान" होने की चेतावनी देता है । किंतु अब पृथ्वी पर तो 24 घंटे ध्वनि विस्तारक यंत्रों की गूँज बनी रहती है, जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है । या फिर यूँ कहें कि हमारी सुनने की क्षमता अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है ।
                                                             
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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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