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समीक्षा : मालवी शब्दकोश -एक दृष्टि - समीक्षक , डॉ विजय कुमार पाठक , उज्जैन



समीक्षा : 

मालवी शब्दकोश -एक दृष्टि

 "मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुखम न च सुखम" दृढ़ संकल्प वाला व्यक्ति कार्य की पूर्णता के लिए सुख-दुख की चिंता नहीं करता , भर्तहरी का उपरोक्त सूक्त, मालवी भाषा/बोली को पूर्व कालानुसार जन जन की  लोक प्रिय बनाने एवं विकास करने के लिए प्रयत्नशील बाबा बैजनाथ की धारा पर जन्म लेकर उनके ही आशीर्वाद से उन्नत शिखर को छूने वाली हेमलताशर्मा *भोली बेन* पर सटीक बैठती है, इसी तारतम्य में मालवी की सभी विधा का साहित्य लेखन, व अनेक रचनाओं का अनुवाद, जिन में  श्री हरिशंकर परसाई जी की काव्य रचना *तट की खोज* का *किनारा की खोज* के रूप में प्रस्तुतीकरण बहुत सराहनीय है,।               अनेक मंचों पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मान प्राप्त कर, व *लंदन में  एक पुस्तक का विमोचन* इनका नाम विश्व पटल पर स्वर्ण अक्षरों से अंकित कर चुका है। सोशल मीडिया के माध्यम के साथ  9 पुस्तकों का प्रकाशन, तथा  अनेक  साहित्य संकलन में साझेदारी इनकी बौद्धिक प्रखरता दर्शाता है, ।    *मालवी शब्दकोश* इसी का  परिणाम है।
                पद्मश्री हरिवंश राय बच्चन के संदेश "राह पकड़कर एक चला चल पा जावेगा मधुशाला" को आत्मसात कर अपने उद्देश्य पथ पर निरंतर अपनी पदछाप छोड़ते हुए शिखर की और बढ़ रही है, यह ग्रंथ केवल मालव वासियों  के लिए ही नहीं अपितु वैश्विक समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण है ।            नियमित दिनचर्या के  सब्जी, फल, शारीरिक अंग जंतुओं, रसोई में उपयोग किए जाने वाली सामग्री, मसाले, एवं कार्यालयीन वस्तुओं के अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग किया है जो वर्तमान में आधुनिक शिक्षा प्राप्त छात्रों युवाओं एवं अंग्रेजीदा व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है। मालवा का रहने वाला चाय और गाली के बगैर कैसे चैन से रह सकता है? इसलिए मालवी गालियों को भी इसमें सम्मिलित किया  है। किसी भी भाषा के लिए व्यंग, ज्ञान, विद्वत्ता, पथ प्रदर्शन, तुलनात्मक विवेचन , आदि के लिए लोकोक्ति एवं मुहावरे आवश्यक अंग है, इसी को देखते हुए लेखिका ने मालवी लोकोक्ति व मुहावरों का समावेश किया है, । जीवित रहने के लिए जिस प्रकार अपनी सांसे आवश्यक है उसी प्रकार भाषा के लिए व्याकरण अनिवार्य है, अतःव्याकरण  को कैसे विलुप्त किया जा सकता है ? लेखिका ने इन समस्त पुष्पों को एकत्रित कर स्वर्णवल्ली का रोपण किया है। अंत में केवल नीति शतक का सूत्र  *निश्चितार्था द्वि रमन्ति नधीरा:* धैर्यवान और दृढ़ निश्चयी लोग अपने निश्चित किए हुए लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटते, कहते हुए हृदय तल से बधाई ,अनेक शुभकामनाएं। 

  समीक्षक       
  डॉ विजय कुमार पाठक , उज्जैन
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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