लघु कथा :
जिम्मेदारी
हिंदी दिवस का समारोह चल रहा था। मंच पर बड़े-बड़े बैनर लगे थे—
“हिंदी हमारी शान है, हिंदी हमारा स्वाभिमान।”
वक्ताओं के भाषण तालियों से गूँज रहे थे। कोई हिंदी को माँ कह रहा था, कोई संस्कृति की पहचान।
कार्यक्रम समाप्त हुआ तो सभागार के बाहर एक विद्यार्थी ने अपनी शिक्षिका से पूछा—
“मैम, हिंदी दिवस तो हर साल मनाते हैं, लेकिन क्या हिंदी के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी भी है?”
शिक्षिका कुछ क्षण चुप रहीं।
उन्होंने सामने पड़े कूड़ेदान की ओर इशारा किया। उसके पास हिंदी में लिखा एक पोस्टर जमीन पर पड़ा था—
“हिंदी का सम्मान करें।”
शिक्षिका ने पोस्टर उठाया और कहा—
“यही हमारी पहली जिम्मेदारी है—जिस भाषा के सम्मान की बात हम मंच से करते हैं, उसे अपने व्यवहार में भी सम्मान दें।”
विद्यार्थी ने पूछा—
“बस इतना ही?”
शिक्षिका मुस्कुराईं—
“नहीं। हिंदी बोलना जिम्मेदारी है, उसे सही ढंग से लिखना जिम्मेदारी है, नई पीढ़ी तक पहुँचाना जिम्मेदारी है और सबसे बड़ी बात—हिंदी को केवल एक दिन याद न करना, बल्कि अपने जीवन में उसका सम्मान बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।”
विद्यार्थी ने पोस्टर फिर से दीवार पर लगाया।
नीचे लिख दिया—
“हिंदी दिवस मनाना उत्सव है,
हिंदी को जीना हमारी जिम्मेदारी।”
उस दिन सभागार में कोई भाषण नहीं हुआ,
लेकिन हिंदी ने पहली बार अपने लिए एक सच्ची जिम्मेदारी निभाते हुए देखी।
- डॉ. सुशील कुमार राम
कोलकाता
पश्चिम बंगाल
Tags:
कथा कहानी
.jpg)