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काव्य :उम्मीद की डोर थामे रखना -पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर


काव्य :

उम्मीद की डोर थामे रखना 

उम्मीदें ही तो जीवन है ,आशा की पतवार लिए 
जीवन की चंचल लहरों पर साथी,साहिल पार करेंगे।
उम्मीद की डोर थामे रखना हम सूरज अपना गढ लेंगे 
न झुके कभी संघर्षो में हम कांटों को भी सह लेंगे।
चटक चांदनी के आंगन में,सुख की दुनिया रच लेंगे
किरणों के झूले में साथी बचपन अपना जी लेंगे
भूल धरा की आपाधापी खुशियां अपनी ढूंढेंगे
राह भले हो निपट अंधेरी,हम सूरज बन दहकेगे।
कठिन कंटकित जीवन पथ पर, हंसते हंसते चल देंगे
तुम मेरी देहरी पर केवल एक दीया बन कर देखो
हम आंगन,शत-शत दीपों का विमल उजास भरेंगे।
दीप जले या मन के आंसू,दुख की गाथा अपनी है
नभ के मोती चल लहरों पर सहज संजोती धरती है।
नदिया की चंचल धारा में कितने तूफान छले गए
दूर किनारे बैठी रजनी अकथ कहानी कहती है।
शीतल चंद्र किरण कहती है, शीतलता ही जीवन दर्शन
कर्मठता की आग प्रबल हो,मन को सरल बना ही लेंगे।
उम्मीदें ही तो जीवन है ,आशा की पतवार लिए 
जीवन की चंचल लहरों पर साथी,साहिल पार करेंगे।

- पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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