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वन्दे मातरम् - सरोज लता सोनी , भोपाल



वन्दे मातरम्

"*जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी*
हमारे धार्मिक ग्रंथो कहा गया है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है* 
और आज अपनी माता और मातृभूमि की वंदना करने से इनकार किया जा रहा है!
आजादी के सपनों को साकार करने वाला यह गीत 
*वन्दे मातरम्* 
उस समय आजादी की लड़ाई में हमारे देश के कई महान साहित्यकारों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है । और उस समय भारतवासियों में राष्ट्रभक्ति की भावना  जागृत करने का काम, एक साहित्यकार ही कर सकता था। और जिस समय यह गीत लिखा गया उस समय आजादी की लड़ाई अपनी सीमा पर थी। 
1857 में  हुए स्वतंत्रता संग्राम में यह गीत पहली बार गाया गया। 
किन्तु अब आजादी पाने के बाद इसी गीत की इतनी अवहेलना,?इतना विरोध क्यों?
जबकि इसका अर्थ ध्यान से पढ़ा जाए तो जाए तो एक भी बात सम्प्रदाय वादी नहीं है। और न हि यह गीत किसी धर्म सम्प्रदाय को हानि पहुँचा रहा है।
 इसे केवल राजनीतिक मुद्दा बना कर  हमारी युवा पीढ़ी को भ्रमित किया जा रहा है!
आजादी के समय इस गीत की इतनी आवश्यकता,  या महत्ता थी के इसी गीत को गाते हुए लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, खुदीराम बोस, सुभाष चंद्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ आदि  कई वीर बलिदानियों ने इसी गीत को आजादी के गीत के रूप में गाया और मरते दम तक वंदे मातरम् का नारा लगाया !
क्या वे सब गलत थे !शायद विरोध करने वाले  महानुभावों ने इसके अर्थ को ठीक  से समझा ही नहीं है!
या समझना ही नहीं चाहते! 
उनका तो उद्‌देश्य बस विरोध करना है।
जबकि आज भी इस गीत के गाने से अधिकांश भारतवासी अपनी मातृ‌भूमि के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं। 
आज वन्देमातरम् का विरोध करने वाले न केवल उस गीत का विरोध कर रहे हैं बल्कि अपनी मातृभूमि भारत माता का अपमान कर रहे हैं!
 साथ ही गंगा यमुना जैसी पवित्र नदियों और अपनी धरती माता का भी विरोध है। 
और यदि यह कहा जाये कि इसमें मूर्ति की पूजा है! तो यह कहना उचित नहीं है। इस गीत के माध्यम से   कवि ने हमारी शस्य, श्यामला धरती की सुन्दरता, मलयज पर्वत से आने वाली सुगंधित हवा, प्राणवायु और गंगा जैसी पवित्र नदियों के जल की महत्ता तथा सरस्वती माँ के समान ज्ञान मयी और दुर्गा व काली  माँ के समान  दुष्टों  का संहार करने वाली शौर्य ,धैर्य और वीरता को बतला कर अपनी मातृभूमि भारत भूमि की विशेषता व महत्व बतलाना चाहता है! 
क्या यह भावना भला किसी धर्म या जाति को नुकसान पहुँचाने वाली है?
फिर भी विरोध करने वाले उसके गूढ़ अर्थ को नहीं समझ रहे हैं!
जरा विचार करें जिस भारत  भूमि में हम रह रहे हैं ,उसका अन्न, जल गृहण कर रहे हैं! हम उसी की वंदना करने से इंकार कर रहे हैं?
*हमारी भारत माता हमेशा से वंदनीय थी,
वंदनीय रही है और आगे भी  वंदनीय ही रहेगी* 
और भारत माता की वंदना करना हम सब का कर्तव्य भी बनता है! वरना ये कृतघ्नता होगी!

तो आइए हम सब मिलकर अपनी युवा पीढ़ी को भी यही संदेश देते हुए एक साथ  मिलकर भारत माता की वंदना करते हैं! 
*भारत माता की जय वंदे मातरम्*

 - सरोज लता सोनी , भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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