वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़
- डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा
साहित्य केवल मनोरंजन या सौन्दर्य की अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं होता,वह इतिहास के निर्णायक क्षणों में समाज व राष्ट्र के अंतर्मन को भी स्वर प्रदान करता है। भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में साहित्य ने इसी प्रकार राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 07 नवम्बर 1875 ई० को बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित राष्टगीत ' वंदेमातरम् ' साहित्यिक पत्रिका ' बंग दर्शन ' में प्रकाशित हुआ था तदन्तर सन् 1882 ई० में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ' आनंदमठ ' में शामिल किया गया था। सन् 1896 ई० में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में संगीत के साथ गाया था। सन् 1905 ई० में बंग-भंग विरोधी आंदोलन में यह व्यापक राजनीतिक उद्घोष बन गया और संविधान सभा द्वारा स्वतन्त्रता के पश्चात् 24 जनवरी 1950 ई० को इसे राष्ट्रगीत का दर्ज़ा दिया गया। उन्नीसवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक शोषण और सामाजिक-सांस्कृतिक संक्रमण से गुजर रहा था। अंग्रेजी शासन ने प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण के साथ-साथ ऐसी औपनिवेशिक दृष्टि भी विकसित की, जिसमें भारतीय समाज को पिछड़ा और अक्षम सिद्ध करने की प्रवृत्ति दिखाई देती थी। ऐसे संक्रमणशील वातावरण में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास, निबंध और कविता के माध्यम से भारतीय समाज के सम्मुख उसकी सांस्कृतिक शक्ति और आत्मबोध के प्रश्न रखे। ' वंदेमातरम् ' इसी वैचारिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण परिणाम था।
' वंदेमातरम् ' की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक विशेषता मातृभूमि का मानवीकरण है। माता का सम्बोधन राष्ट्र के साथ भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है। उन्होंने राष्ट्र को केवल भौगोलिक भूखण्ड न मानकर भावनात्मक,सांस्कृतिक और नैतिक सम्बन्ध में रूपांतरित किया। मातृभूमि के प्रति ये श्रद्धा का भाव धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन के प्रति असहमति और स्वतंत्रता की आकांक्षा से जुड़ गया। इस राष्ट्रगीत में प्रकृति और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं। धरती मातृरूप में आती है, हरे-भरे खेत राष्ट्र समृद्धि का संकेत बनते हैं, जल जीवन और उर्वरता का प्रतीक बनता है, वायु स्वतंत्र और जीवंत जीवन का बिम्ब बनती है ,शक्ति और सौन्दर्य राष्ट्र की सामर्थ्य तथा सांस्कृतिक गरिमा को व्यक्त करते हैं। इस प्रकार प्रकृति वर्णन राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है। जिस भूमि पर विदेशी सत्ता का अधिकार है,वही भूमि साहित्य में माता के रूप में प्रतिष्ठित होती है। यही परिवर्तन औपनिवेशिक सत्ता की वैधता के सामने एक सांस्कृतिक प्रतिप्रश्न उपस्थित करता है। वंदेमातरम् का उद्घोष इसलिए भी प्रभावशाली बना क्योंकि वह तर्क से पहले संवेदना को सम्बोधित करता था। वह व्यक्ति को नागरिक या प्रजा के रूप में नहीं अपितु मातृभूमि की संतान के रूप में देखने की प्रेरणा देता था। यही साहित्यिक रणनीति उसे जनचेतना में गहराई तक ले गई। आनंदमठ उपन्यास में भी मातृभूमि की कल्पना राष्ट्रीय मुक्ति के विचार से जुड़ती है परिणामस्वरूप वंदेमातरम् केवल गीत न रहकर कथा के वैचारिक वातावरण का प्रतिनिधि बन पाता है। साहित्य की यही शक्ति है कि वह विचार को पात्रों,घटनाओं,प्रतीकों और भावनाओं के माध्यम से पाठक को अनुभव का हिस्सा बना देता है।
सन् 1896 ई०को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा संगीत के साथ वंदेमातरम् का गायन एक महत्वपूर्ण घटना है,जिसने इस गीत को केवल साहित्यिक पाठक वर्ग तक सीमित नहीं रखा अपितु वह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर पहुँच गया। महान कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गायन इस गीत के साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रभाव को विस्तृत करता है, संगीत ने स्मरणीय बनाया, सामूहिक गायन ने इसे सामाजिक अनुभव में बदल दिया। इसी प्रकार 1905 ई० में बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना थी,जिसमें वंदेमातरम् एक प्रभावशाली प्रतिरोध उद्घोष के रूप में सामने आया। 07 अगस्त 1905 ई०को वंदेमातरम् का राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग हुआ और अक्टूबर 1905 ई०में इसके प्रसार के लिए ' वंदेमातरम् सम्प्रदाय ' जैसी संस्था बनी, जिसके सदस्य प्रभात फेरियों में इसे गाते थे। इन गतिविधियों के कारण यह गीत जनसंस्कृति का हिस्सा बन गया। यही सामूहिकता औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध जनमनोबल का आधार बनी। गीत से उद्घोष बनने की यात्रा में वंदेमातरम् की भाषिक संक्षिप्तता और भावनात्मक तीव्रता की विशेषता भी है,जिसके कारण छोटा-सा उद्घोष सामूहिक भावनाओं को व्यक्त करने में सक्षम हुआ। जब कोई व्यक्ति अकेले वंदेमातरम् गाता है तो वह अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान व्यक्त करता है और जब हजारों लोग उद्घोष करते हैं तो वही शब्द सामूहिक अस्मिता का प्रतीक बन जाता है। धीरे-धीरे यही गीत स्वतंत्रता आन्दोलन की पहचान से जुड़ गया।
अंतत: हम कह सकते हैं कि साहित्य प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्यवाही का विकल्प नहीं होता किन्तु वह उन भावनाओं और विचारों को जन्म दे सकता है, जिनसे सामाजिक परिवर्तन की ऊर्जा उत्पन्न होती है। एक राजनीतिक आंदोलन को केवल संगठन नहीं बल्कि साझा कल्पना की भी आवश्यकता होती है। वंदेमातरम् ने भारत की ऐसी कल्पना प्रस्तुत की, जिसमें राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई था। औपनिवेशिक शासन के सामने प्रतिरोध करने के लिए केवल राजनीतिक संगठन पर्याप्त नहीं था। जनता के भीतर यह विश्वास उत्पन्न करना भी आवश्यक था कि वह स्वयं को बदल सकती है और स्वतंत्र भविष्य की कल्पना कर सकती है। वंदेमातरम् ने इसी मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभाव डाला और औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ बन गया। मातृभूमि की प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामूहिकता,स्वतंत्रता की आकांक्षा तथा भारत को हीन मानने वाली दृष्टि के सामने भारतीय आत्मसम्मान को स्थापित करना आदि अनेक प्रतिरोध के आयाम हैं। इन तत्वों ने ही स्वतंत्रता आन्दोलन की सांस्कृतिक भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था। इस प्रकार वंदेमातरम् भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का केवल एक गीत ही नहीं था अपितु उस युग के आत्मसम्मान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता आकांक्षा की साहित्यिक अभिव्यक्ति था।
- डाॅ०राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा, उ०प्र० 207001
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