काव्य :
अभिशाप!
सिद्धार्थ सा गगन छूता बुद्ध होना था मुझे,
पर सृष्टि ने यशोमति का मौन मुझे सौंप दिया।
लगा, राह मेरी अपनी होगी—
मगर नियति ने इतिहास का वही पुराना पन्ना फिर खोल दिया।
क्या यही संपूर्ण सत्य था?
जब सीता ने मातृत्व का आंचल समेटा,
नियति ने फिर वनवास का कांटा रोपा।
वृंदा के माथे जब छल का आवरण सजा,
चेहरे बदलते रहे, पर कलंक का दीप वहीं जला।
अहिल्या का पाषाण होना,
या सीता की अग्नि-परीक्षा—
तह तक जब दृष्टि उतारी,
तो अटल बस एक ही सच पाया:
इस धरा पर 'नारी होना' ही उसकी सबसे बड़ी सज़ा थी!
इसी मूक वेदना ने,
यशोधरा को बुद्ध बनने से रोक दिया।
चार दीवारों की उस विवश चौखट के भीतर,
उन्हें वैसी ही चिर-निद्रा में सुला दिया,
जैसी नींद में उर्मिला सदियों से सोती आई थीं।
चरणों की धूल को मस्तक का श्रृंगार बनाने की जिद में,
उन्होंने केवल प्रतीक्षा और त्याग का व्रत चुना।
समाज ने उन्हें 'देवी' का आसन तो दे दिया,
पर उस हाड़-मांस की जीवित देह से,
उसका अपना पूरा संसार छीन लिया।
सोचिए...
इस स्वर्णिम आवरण के तले,
स्त्री होना ही उसका एकमात्र अभिशाप है?
— अभिलाषा श्रीवास्तव, गोरखपुर
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