काव्य :
गूँजे हमारी भारती
शंखनाद की मधुर गूँज…जहाँ कृष्ण बने सारथी
अलौकिक गौरव प्रदत्त …..हमारी माता भारती।
महान विभूतियों के संगम की महानतम अनुभूति
नित्य गौरवान्वित होकर …..गूँजे हमारी भारती।
हिंदी हमारी भाषा, हमारा मान, हमारा अभिमान
हमारी गौरव गाथा का नित करती सरस बखान
ये धरोहर है हमारे पूर्वजों की, ये हमारी पहचान
मृदुभाषी, सरिता सी कल कल….ओजस्वी गान।
आज मुक्त कंठ से करता इसका विश्व गुणगान
हिंदुस्तान की आत्मा ये, धड़कन इसका हिंदुस्तान
सरल, सरस, सहज, समृद्ध हिंदी भाषा का विधान
इंद्रधनुषी अनुपम छटा बिखेरता इसका परिधान।
मनोरम, मृदुल, मनोहारी है……इसकी मधुर बोली
ये दिवाली की है दिव्य जोत. …..ये रंगों की होली
उन्नत भाल संपन्न, समृद्ध, सुंदर, सजती ज्यों रोली
स्नेह डोर से बाँधें सबको ………..ये सबकी हो ली।
ये माँ का ममत्व………..ये हर बहन की अभिलाषा
स्नेह सिक्त इसकी मधुर वाणी…ये सबकी आशा
विश्वबंधुत्व भावना, वसुदधैव कुटुंबकम परिभाषा
है रची बसी हमारे मन प्राण में, हिंदी हमारी भाषा।
भिन्न प्रांत, भिन्न भाषा, भिन्न परिवेश….का संगम
भिन्न जाति, भिन्न धर्म, भिन्न समुदाय का समागम
भिन्नता में एकता का बन ..मधुर गीत गूँजे अनुपम
हिंदी हमारा मान, हमारा गौरव…….हिंदी से हैं हम।
- भार्गवी रविंद्र.. बेंगलूरु ,कर्नाटक
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