शिक्षा वह है, जो हमें ज्ञान के साथ संस्कार दे : आर्यिका भावनामति
इटारसी। शिक्षकों ने केवल हमें पढ़ाया ही नहीं, बल्कि जीवन को समझने की दृष्टि भी दी। शिक्षक केवल वह नहीं है, जो हमें किताबों का ज्ञान दे। सच्चा शिक्षक वह है, जो विद्यार्थी के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे सही दिशा प्रदान करे। शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छी नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक अच्छा मनुष्य बनना भी है।
यह बात आर्यिका भावनामति ने कही। महावीर भवन में उन्होंने कहा कि
आज के समय में कहीं-कहीं शिक्षा का अर्थ अंक, डिग्री, प्रतियोगिता और रोजगार तक सीमित होता जा रहा है। लेकिन भारतीय संस्कृति में शिक्षा का अर्थ इससे कहीं व्यापक है।
आर्यिका भावनामति ने समाज को उद्बोधन देते हुए कहा कि शिक्षा वह है, जो हमें ज्ञान के साथ संस्कार, बुद्धि के साथ विवेक और सफलता के साथ सदाचार प्रदान करे।
आर्यिका भावनामति ने बताया कि आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज हमेशा कहते थे— “बच्चों की पीठ पर शिक्षा का बोझ है, किंतु बोध नहीं।” अर्थात शिक्षा केवल किताबों का भार न बने, बल्कि हमारे जीवन में बोध पैदा करे। शिक्षा ऐसी हो, जो हाथों में हुनर, मस्तिष्क में विवेक और हृदय में संस्कार पैदा करे। शिक्षा केवल अर्थोपार्जन के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ और आत्मोन्नति के लिए भी होनी चाहिए। यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है—ज्ञान के साथ विवेक, सफलता के साथ संस्कार और स्वयं के विकास के साथ समाज के प्रति संवेदनशीलता। एक सच्चा शिक्षक इसी जीवन-दृष्टि का निर्माण करता है।
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