विश्व साक्षरता दिवस पर काव्य गोष्ठी संपन्न
छिन्दवाड़ा । विश्व साक्षरता दिवस पर कवि रामलाल सराठे की अध्यक्षता में भारत माता दिव्यांग छात्रावास नई आबादी छिंदवाड़ा में सरस काव्य गोष्ठी संपन्न हुई ! कार्यक्रम का प्रारंभिक संचालन विशाल शुक्ल ने तथा काव्य गोष्ठी का संचालन ऑल राउंडर कवि रत्नाकर रतन ने किया और आभार प्रदर्शन पाठक मंच के संयोजक विशाल शुक्ल ने किया ! कार्यक्रम आगाज कवयित्री सुश्री कामिनी सूर्यवंशी द्वारा प्रस्तुत मां सरस्वती की वन्दना से हुआ !
कवि राहुल चौरिया ने अपनी रचना पढ़ी...
“ गांव में रहके लगता था शहर नहीं मिला।
उड़ने के वास्ते खुला अम्बर नहीं मिला।
मिल गया शहर मिली बुलंदी भी मग़र
अपनों से दूर हमको कहीं घर नहीं मिला।"
व्यंग के चितेरे कवि शशांक दुबे ने वर्तमान परिवेश पर कलम चलाई…
“अंग्रेज़ी के सिर पर सिर्फ़ आंटी का ही साया था।
उधर हिन्दी, मामी-चाची मौसी और बुआओं से घिरी बैठी थी"
हरिओम माहोरे “अर्पण” ने हिंदी भाषा की खूब सूरती को कविता में पिरोया…
“निकल कर माँ के मुख से एक बच्चे के कानों तक,
पहुँची है निकल ब्रह्मांड से संगीत के तानों तक।
हृदय सम्वेदनाओं से लिखित पहली रची चिठ्ठी,
सभी यात्रा पूरी कर आज पहुँची डाक खानों तक।
पश्चिमी सभ्यता की गोद में जा भूल न जाना,
हमारी मातृ भाषा का सदा ही बोल बाला हैं।
ग़ज़ल में गीत में हमने कभी दोहा में ढाला है,
बड़ी नाज़ुक है ये हिंदी जिसे हमने सम्भाला है।"
कवि शशांक पारसे "पुष्प" ने जिंदगी को शब्दों में उकेरा …
“अब मेरी ज़िन्दगी का क्या मिज़ाज़ पूछते हो।
टूटा हैं ज़िन्दगी का साज़ क्या रियाज़ पूछते हो।
कवि द्वारपाल मालवीया "मासूम" ने पढ़ा...
लरज़ते होंठ सीने में दहकती आह में देखो ।
तुम्हारे बाद का मौसम सिसकता है गले मिलकर ।
भरी बारिश में सूखें हैं हरे उन ख़्वाब में देखो
कवयित्री सुश्री कामिनी सूर्यवंशी ने हिंदी का महत्व कविता में दर्शाया...
"हिन्दुस्तान के हिंद की पहचान है हिन्दी।
संस्कृत से जन्मी संस्कृति का मान है हिन्दी।
भारती के भाल में शोभित ऋंगार हैं
मातृभूमि के माँ-जननी के समान है हिन्दी।
कवि दीपक गौर ने सैनिक के जीवन को कविता में उकेरा...
में नहीं जानती क्या बलिदान क्या सेवा क्या सहादत होती है
में तो बस इतना जानू लाल मेरा मेरी आँखों का मोति हैँ
किया लाल ने बहुत परिश्रम आया घर
लौटा एक दिन और कहा है माँ सेना में चयन नहीं हुआ मेरा
कवि विशाल शुक्ल ने पढ़ा
बादलों ने पेड़ पर डेरा डाला है,
आखिर बचपन से इसे पाला है।
जिस ज़मीन को सींचा था खून से,
आज उस पर संकट का जाला है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं कवि रामलाल सराठे ने साक्षरता पर पढ़ा...
चलो हम जला दें ये अक्षर के दीपक,
कहीं जगमगा दें, ये अक्षर के दीपक।
कुहासे में लिपटी हुई बेबसी को,
चलो हम दिखा दें ये अक्षर के दीपक ।।
कार्यक्रम के अंत में कवियत्री बनानी सिंह बघेल एवं कवि रत्नाकर रतन ने भी अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।
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साहित्यिक समाचार
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