ad

लोग हमारे विरोध में खड़े हों और हम अकेले पड़ जाएं, तब भी सत्य के साथ खड़े रहना ही उत्तम सत्य धर्म है


लोग हमारे विरोध में खड़े हों और हम अकेले पड़ जाएं, तब भी सत्य के साथ खड़े रहना ही उत्तम सत्य धर्म है

दसलक्षण महापर्व पर महावीर भवन में आर्यिका भावनामति माताजी के प्रवचन

इटारसी। दसलक्षण महापर्व पर उत्तम सत्य धर्म का संदेश देते हुए महावीर भवन में आर्यिका संघ प्रमुख आर्यिका भावनामति माताजी ने कहा कि “सत्य बोल, चाहे जहां डोल।” पंक्ति भले ही छोटी हो, लेकिन इसके भीतर जीवन का बहुत बड़ा संदेश समाहित है।

उन्होंने कहा कि सत्य बोलना तब आसान होता है, जब सत्य बोलने से हमें कोई नुकसान न हो। जब सामने वाला अपना हो और जब सभी हमारी बात से सहमत हों, तब सत्य बोलना सरल लगता है। लेकिन जब सत्य बोलने से नुकसान होने की आशंका हो, लोग हमारे विरोध में खड़े हों और हम अकेले पड़ जाएं, तब भी सत्य के साथ खड़े रहना ही उत्तम सत्य धर्म है।

माताजी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति धन या रिश्तों के प्रभाव से कुछ समय के लिए असत्य को आगे कर दे तो क्या सत्य समाप्त हो जाता है? नहीं। पैसा देकर किसी के मुंह को कुछ समय के लिए बंद किया जा सकता है, लेकिन सत्य का मुंह कभी बंद नहीं किया जा सकता। कागज बदलने, बयान बदलने या सच्चाई को कुछ समय के लिए ढकने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन सत्य को मिटाया नहीं जा सकता। सत्य किसी व्यक्ति की जेब में नहीं रहता, वह समय के साथ अपना परिचय स्वयं देता है।

उन्होंने कहा कि कभी-कभी व्यक्ति सोचता है कि मेरे पास पैसा है, मैं सब कुछ संभाल लूंगा। पैसा किसी को प्रभावित कर सकता है, किसी को अपने पक्ष में कर सकता है और किसी व्यक्ति को कुछ समय के लिए चुप करा सकता है, लेकिन क्या पैसा सत्य को झूठ में बदल सकता है? नहीं।

माताजी ने कहा कि रिश्वत से असत्य का शोर बढ़ सकता है, लेकिन सत्य की आवाज कभी समाप्त नहीं होती। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, सत्य किसी न किसी रूप में सामने आता ही है। सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं।

उन्होंने कहा कि वाणी में सत्यता और हृदय में शुद्धता ही जीवन की सच्ची सुंदरता है।
----
संयम का अर्थ अपनी इंद्रियों, कषायों और मन को वश में रखना है 
उत्तम संयम धर्म का संदेश

उत्तम संयम धर्म का महत्व बताते हुए आर्यिका संघ प्रमुख आर्यिका भावनामति माताजी ने कहा कि हम सभी चाहते हैं कि हमारा जीवन सुखी, शांत और पवित्र हो, लेकिन प्रश्न यह है कि वास्तविक शांति आएगी कहां से? क्या अधिक धन, अधिक सुविधाओं या दूसरों को बदलने से जीवन में शांति मिल सकती है? नहीं। जब मन पर हमारा शासन हो जाता है, तभी जीवन में वास्तविक शांति आती है और मन पर शासन का नाम ही संयम है।

माताजी ने कहा कि संयम का अर्थ अपनी इंद्रियों, कषायों और मन को वश में रखना है। किसी चीज को देखने की इच्छा न हो तो यह आंखों का संयम है। किसी की बात सुनने की अनावश्यक उत्सुकता न होना कानों का संयम है। मन में जो आया, उसे तुरंत बोल देना नहीं, बल्कि सोच-समझकर बोलना वाणी का संयम है।

उन्होंने कहा कि इससे भी बड़ा संयम मन को वश में करना है, क्योंकि बाहर की वस्तुओं को रोकना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन मन में उठने वाले विचारों को रोकना कठिन है। किसी ने कुछ कह दिया तो मन तुरंत कहता है कि मैं भी उसे जवाब दूंगा। लेकिन संयम कहता है कि पहले भीतर देखो—क्या जवाब देने से मेरी आत्मा शांत होगी? यही संयम का क्षण है।

माताजी ने कहा कि क्रोध आया और आपने उसे रोक लिया, किसी ने अपमान किया और आपने प्रतिशोध नहीं लिया, किसी ने प्रशंसा की और आपने अहंकार नहीं किया, लोभ आया और आपने उस वस्तु को छोड़ दिया—ये सभी संयम के उदाहरण हैं।

उन्होंने कहा कि हम सोचते हैं कि संयम केवल मुनिराजों के जीवन के लिए है, लेकिन गृहस्थ जीवन में भी संयम की उतनी ही आवश्यकता है। भोजन में संयम, वाणी में संयम और क्रोध में संयम जरूरी है। इन सबसे भी महत्वपूर्ण है कषायों में संयम।

माताजी ने कहा कि हम दूसरों से कहते हैं कि क्रोध मत करो, लेकिन क्या हमने स्वयं क्रोध न करने का संकल्प लिया है? हम दूसरों से कहते हैं कि मीठा बोलो, लेकिन क्या हमने अपने आप से कहा है कि हमारी वाणी किसी के हृदय को चोट नहीं पहुंचाएगी? संयम की शुरुआत यहीं से होती है।

उन्होंने कहा कि संयम के सबसे बड़े शत्रु क्रोध, मान, माया और लोभ हैं। क्रोध कहता है—अभी जवाब दो। मान कहता है—मैं किसी से कम नहीं हूं। माया स्वार्थ के लिए छल-कपट की ओर ले जाती है और लोभ कहता है—अभी और चाहिए।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post