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"शब्दों की बिगड़ी भाषा पर गर्व करें या शर्म?" -विमलचंद्र जैन "मच्छी रक्षक"स्तंभकार एवं चिंतक


प्रसंगवश ~ विशेष आलेख

"शब्दों की बिगड़ी भाषा पर गर्व करें या शर्म?"

 -विमलचंद्र जैन "मच्छी रक्षक"
स्तंभकार एवं चिंतक

प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर

       अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अभद्रता की स्वतंत्रता नहीं है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मर्यादा के साथ ही सार्थक है। तभी कहा गया है - "जब शब्दों की मर्यादा मरती है, तब सभ्यता घायल होती है।"
“जब राजनीति में भाषा की मर्यादा तार-तार होने लगे, तो समझ लीजिए कि केवल शब्दों का पतन नहीं हो रहा, बल्कि देश की संस्कृति, संस्कार और सभ्यता पर भी आघात हो रहा है।”

*शब्द शक्ति हैं, हथियार नहीं*

शब्दों की मर्यादा ही हमारी सभ्यता, संस्कृति की पहचान है। प्रकृति ने मनुष्य को अभिव्यक्ति की अद्भुत शक्ति दी है। शब्द रिश्ते जोड़ सकते हैं और तोड़ भी सकते हैं, समाज को दिशा दे सकते हैं और भटका भी सकते हैं। इतिहास गवाह है कि एक विचारपूर्ण शब्द ने युग बदले हैं, जबकि अपमानजनक शब्द ने संघर्षों को जन्म दिया है।
समस्या तब शुरू होती है, जब शब्द विचारों के दूत बनने के बजाय अहंकार के हथियार बन जाते हैं। आज असहमति को दुश्मनी समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। तर्क की जगह तंज और संवाद की जगह गाली-गलौज लेती जा रही है। राजनीति के मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक, ऐसा प्रतीत होता है कि लोग अपने विचारों को मजबूत करने के बजाय दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ में लगे हैं।
यह समझना जरूरी है कि कठोर विचार और अभद्र भाषा में जमीन-आसमान का अंतर है। तीखा सवाल पूछना लोकतंत्र है, गाली देना नहीं। सत्ता से सवाल करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन किसी को अपमानित करना विचारों की मजबूती का प्रमाण नहीं। सवाल यह है कि क्या ऐसी भाषा पर गर्व किया जा सकता है, जो हमारी सभ्यता और संस्कारों पर ही प्रश्नचिह्न लगा दे?

*भाषा का पतन, विचारों का भी पतन ?*

शब्द केवल मुंह से नहीं निकलते, वे हमारी सोच, संस्कार और मानसिकता की अभिव्यक्ति होते हैं। पद, पैसा और डिग्रियां उपलब्धियों का परिचय दे सकती हैं, लेकिन भाषा ही व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व का असली परिचय देती है।
आज बिगड़ी भाषा को निर्भीकता कहा जा रहा है। गाली को बेबाकी, अपमान को स्पष्टवादिता और ऊंची आवाज को साहस समझने की भूल हो रही है। जबकि सच्ची निर्भीकता वह है, जो बिना अपशब्दों के भी समाज और सत्ता से तीखा सवाल पूछ सके और अन्याय के सामने अडिग खड़ी हो सके।
जब घरों में और मंचों पर शब्दों की मर्यादा टूटने लगे और सोशल मीडिया पर किसी को नीचा दिखाना ही मनोरंजन बन जाए, तो यह केवल व्यवहार की नहीं, संस्कारों के क्षरण की निशानी है।
बिगड़ी भाषा पर गर्व करना, आज अपनी उपलब्धि समझने जैसा है। इस पर ताली नहीं, आत्ममंथन चाहिए।

*मतभेद ही लोकतंत्र है, मनभेद और गाली नहीं*

लोकतंत्र की खूबसूरती ही मतभेद है, यहां विचार अलग हो सकते हैं, और सरकार की नीतियों का विरोध भी किया जा सकता है।
लेकिन जब वे व्यक्तिगत शत्रुता में बदल जाते हैं, तब लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ने लगता है।
बहस का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अपमानित करना नहीं, बल्कि विचारों और तर्कों की कसौटी पर सही-गलत को परखना होना चाहिए। सरकार की नीति हो या किसी सार्वजनिक व्यक्ति का आचरण—उस पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन सवाल तथ्यों, तर्कों और मर्यादित भाषा के आधार पर उठाए जाने चाहिए।
याद रखिए, अपमानजनक शब्दों से किसी को चुप कराया जा सकता है, लेकिन सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। नफरत से भीड़ जुटाई जा सकती है, लेकिन उससे सभ्य समाज और मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं होता।
जब भाषा में तर्क कमजोर और अपमान प्रबल हो जाए, वहां संवाद पीछे छूट जाता है, अहंकार आगे आ जाता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि कौन क्या बोल रहा है, बल्कि यह भी है कि हम कैसी टुच्ची और अमर्यादित सार्वजनिक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।
*भाषा बदलेगी तो समाज बदलेगा:—
हम अक्सर कहते हैं कि समाज बदलना चाहिए, पर भूल जाते हैं कि समाज हमारे ही व्यवहार से बनता है। हमारी भाषा परिवारों में संस्कारों को आकार देती है, सार्वजनिक जीवन में विचारों का स्तर तय करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करती है।
यदि समाज में अपमान सामान्य हो जाए, राजनीति में कटुता, शत्रुता और अहंकार प्रतिष्ठा का साधन बन जाए, सार्वजनिक मंचों पर अभद्रता को साहस माना जाने लगे, तो सभ्यता की बाहरी चमक के बावजूद उसके भीतर का आधार कमजोर होने लगता है।
इसलिए हमें ऐसी भाषा और संवाद संस्कृति विकसित करनी होगी, जो—
कठोर हो, लेकिन कटुता से भरी न हो। निर्भीक हो, लेकिन अश्लील न हो। व्यंग्य करे, लेकिन अनावश्यक अपमान न करे। विरोध करे, लेकिन मानवीय मर्यादा न लांघे। सवाल उठाए, लेकिन तथ्यों और तर्कों का साथ न छोड़े।
हमें बच्चों को यह सिखाना होगा कि बड़ा वह नहीं, जो सबसे ऊंचा बोलता है; बड़ा वह है, जो असहमति के बीच भी अपने शब्दों की मर्यादा बनाए रखता है।
*बिगड़ी भाषा पर गर्व नहीं, आत्ममंथन होना चाहिए:—
तो अंतिम सवाल यही है— बिगड़ी जुबान पर गर्व करें या शर्म?
उत्तर साफ है: अभद्रता पर गर्व नहीं, आत्ममंथन होना चाहिए। क्योंकि सुधार अपनी गलती पहचानने से ही शुरू होता है। जब शब्दों की मर्यादा टूटती है, तो केवल भाषा दूषित नहीं होती—विचारों का स्तर गिरता है, रिश्तों में कटुता बढ़ती है और लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है। समाज सड़ने लगता है।
हमें ऐसी संस्कृति चाहिए जहां तर्क गाली से बड़ा हो, विचार अहंकार से ऊंचा हो और असहमति में भी सम्मान बचा रहे। सभ्य समाज वह नहीं जहां सब एक जैसा सोचें; सभ्य समाज वह है जहां अलग सोचने वाले भी एक-दूसरे को सुन सकें। समझ सकें और समन्वय स्थापित हो सके।
*याद रखिए, अपशब्दों से सिर्फ भाषा नहीं टूटती— रिश्ते टूटते हैं, विचार गिरता है और लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।
शब्द हथियार भी है और उपचार भी। तय हमें करना है कि हम शब्दों से समाज को जोड़ेंगे या तोड़ेंगे।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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