काव्य :
दृष्टि दोष
पता नहीं क्यों
सुबह से जेह्न में गूँज रही हैं
प्रभु यीशु की पंक्तियाँ
प्रभु इन्हें माफ कर देना
ये नहीं जानते कि
ये क्या कर रहे हैं।
पता नहीं क्यों
हर चेहरे पर ये पंक्तियाँ
चिपकी हुई सी
दिखाई देती हैं
और चेहरा भयावह
हिंसा में सना।
जो स्वयं को विद्वान
निरूपित करते हैं
उनके चेहरे तो
और भी अजीब
दिखते हैं।
हे प्रभु
मेरा दृष्टि दोष
दूर करो।
- डॉ सत्येंद्र सिंह
पुणे महाराष्ट्र
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काव्य

सभी के मन की बात है। ☹️🙏
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