काव्य :
गुब्बारा नहीं हूं
लड़ रहा हारा नहीं हूं ।
कोई बेचारा नहीं हूं।
तुम जहां भी मन हो जाओ ।
साथ हूं कारा नहीं हूं।
मैं बहुत मीठा न लगता।
सोच में खारा नहीं हूं।
तेज चलती इस हवा में।
उड़ता गुब्बारा नहीं हूं।
प्यार तुम भी मुझसे करना ।
इश्क का चारा नहीं हूं।
पास आकर खुश तो हो न ।
चांद या तारा नहीं हूं।
रुख नहीं बदलूंगा अपना।
वक्त का धारा नहीं हूं।
- आर एस माथुर , इंदौर
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