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गीत : बर्षा की रिमझिम - डॉ.सुशील गुरू भोपाल


 

गीत

बर्षा की रिमझिम


बर्षा की रिमझिम में, पृथ्वी के आंगन में

बाजन लगे मृदंग।


नभ के वक्षस्थल पर 

घनिकायें श्वेत श्याम, अभिनव श्रंगार किए,

स्वप्निल भुजाओं में,।मद के मधुकलश लिए,कजरारे जलद लिए

फुहराती मलयानिल सिहराती अंग अंग


सावन झकोरों में, 

अंजलि कटोरों में मदिरा छलकती है,

बिसरे मनुहारों की,

प्रतिमा झलकती है, आशा ललकती है।

अब की बरसातों में, पूर्ण होगी उमंग।


सरयू किनारे पर,

चातक के स्वर प्रवीण,विरहन की प्यास लिए

प्रिय के समागम का 

हृदय में विश्वास लिए, मिलने की आस लिए

गाते हैं प्रणय के गीत बनकरके जलतरंग।


बर्षा की रिमझिम में, पृथ्वी के आंगन में

बाजन लगे मृदंग।

-- डॉ.सुशील गुरू भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. बर्षा की रिमझिम में गीत देखा। धन्यवाद और आभार

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