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शिव भस्म क्यों धारण करते है ! आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार,नर्मदापुरम


शिव भस्म क्यों धारण करते है !

आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार 


          शिव ही सर्वज्ञपरिपूर्ण और अनंत शक्तियों को धारण किए हैं। जो मनवचनशरीर और धन से शिव भावना करके उनकी पूजा करते हैंउन पर शिवजी की कृपा अवश्य होती है। शिवलिंग में शिव की प्रतिमा ने शिव भक्तजनों में शिव की भावना करके उनकी प्रसन्नता के लिए पूजा का विधान है जो शरीरमनवाणी और धन से करते हैं  भगवान शिव की विशेष कृपा पाते है और शिवलोक में निवास का सौभाग्य प्राप्‍त करते है। जब आराधक को शिव साधना से तन्मात्राएं वश में हो जाती हैंतब जीव जगदंबा सहित शिव का सामीप्य प्राप्त कर लेता है।  प्रकृतिबुद्धित्रिगुणात्मक अहंकार और पांच तन्मात्राएं आदि आठ तत्वों के समूह से देह की उत्पत्ति हुई है, अर्थात पृथ्वी के इन आठ  बंधनों  के कारण ही आत्मा को जीव की संज्ञा मिली है जिसमें देह से कर्म होता है और फिर कर्म से नूतन देह की उत्पत्ति होती है। शरीर को स्थूलसूक्ष्म और कारण के भेद ज्ञात होना चाहिए जिससे हम ओर आप अनभिज्ञ है।

सर्वज्ञता और तृप्ति शिव के ऐश्वर्य हैं। इन्हें पाकर मनुष्य की मुक्ति हो जाती है। इसलिए शिव की भक्ति करने वाले शिव क्रियाशिव तपशिव मंत्र-जापशिव ज्ञान और शिव ध्यान प्रतिदिन प्रातः से रात को सोते समय तकजन्म से मृत्यु तक संपन्न करते हुए शिव को उपलब्ध होते है। पंचाक्षर मंत्र को स्थूल लिंग कहा हैं। पृथ्वी पर पांच लिंग हैंपहला 'स्वयंभू शिवलिंग', दूसरा 'बिंदुर्लिंग', तीसरा 'प्रतिष्ठित लिंग', चौथा 'चरलिंग', और पांचवा 'गुरुलिंगहै। देवर्षियों की तपस्या से संतुष्ट हो उनके समीप प्रकट होने के लिए पृथ्वी के अंतर्गत बीजरूप में व्याप्त हुए भगवान शिव वृक्षों के अंकुर की भांति भूमि को भेदकर 'स्वतः प्रकट होने के कारण ही इसका नाम 'स्वयंभू लिंगहै। इसकी आराधना करने से ज्ञान की वृद्धि होती है। सोने-चांदीभूमिवेदी पर हाथ से प्रणव मंत्र लिखकर भगवान शिव की प्रतिष्ठा और आह्वान करने के साथ सोलह उपचारों से उनकी पूजा की जाती है जिससे साधक को ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

 देवताओं और ऋषियों ने आत्मसिद्धि के लिए 'पौरुष लिंगकी स्थापना मंत्रों के उच्चारण द्वारा की है। यही 'प्रतिष्ठित लिंगकहलाता है। किसी ब्राह्मण अथवा राजा द्वारा मंत्र पूर्वक स्थापित किया गया लिंग भी प्रतिष्ठित लिंग कहलाता हैकिंतु वह 'प्राकृत लिंगहै। शक्तिशाली और नित्य होने वाला 'पौरुष लिंगतथा दुर्बल और अनित्य होने वाला 'प्राकृत लिंगकहलाता है। लिंगनाभिजीभहृदय और मस्तक में विराजमान आध्यात्मिक लिंग को 'चरलिंगकहते हैं। पर्वत को 'पौरुष लिंगऔर भूतल को विद्वान 'प्राकृत लिंगमानते हैं। पौरुष लिंग समस्त ऐश्वर्य को प्रदान करने वाला है। प्राकृत लिंग धन प्रदान करने वाला है। 'चरलिंगमें सबसे प्रथम 'रसलिंगब्राह्मणों को अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है। 'सुवर्ण लिंगवैश्यों को धन, 'बाणलिंगक्षत्रियों को राज्य, 'सुंदर लिंगशूद्रों को महाशुद्धि प्रदान करने वाला है। बचपनजवानी और बुढ़ापे में स्फटिक शिवलिंग का पूजन स्त्रियों को समस्त भोग प्रदान करने वाला है।

विभूति लोकाग्निजनितवेदाग्नि जनित और शिवाग्नि जनित तीन प्रकार की बताई गयी है जिसमें लोकाग्निजनित अर्थात लौकिक भस्म को शुद्धि के लिए रखा जाता है।  मिट्टीलकड़ी और लोहे के पात्रों की धान्यतिलवस्त्र आदि की भस्म से शुद्धि होती है। वेदों से जनित भस्म को वैदिक कर्मों के अंत में धारण करना चाहिए। मूर्ति धारी शिव का मंत्र पढ़कर बेल की लकड़ी जलाएं। कपिला गाय के गोबर तथा शमीपीपलपलाशबड़अमलताश और बेर की लकड़ियों से अग्नि जलाएंइसे शुद्ध भस्म माना जाता है। भगवान शिव ने अपने गले में विराजमान प्रपंच को जलाकर भस्म रूप से सारतत्व को ग्रहण किया है। उनके सारे अंग विभिन्न वस्तुओं के सार रूप हैं। भगवान शिव ने अपने माथे के तिलक में ब्रह्माविष्णु और रुद्र के सारतत्व को धारण किया है। सजल भस्म को धारण करके शिवजी की पूजा करने से सारा फल मिलता है। शिव मंत्र से भस्म धारण कर श्रेष्ठ आश्रमी होता है। शिव की पूजा अर्चना करने वाले को अपवित्रता और सूतक नहीं लगता। गुरु शिष्य के राजसतामस और तमोगुण का नाश कर शिव का बोध कराता है। ऐसे गुरु के हाथ से भस्म धारण करनी चाहिए।

भस्म दो प्रकार की होती है-एक 'महाभस्म और दूसरी 'स्वल्प भस्म'। महा भस्म के भी अनेक भेद हैं- 'श्रोता', 'स्मार्थ', और 'लौकिक। श्रोता और स्मार्थ भस्म केवल ब्राह्मणों के ही उपयोग की है तथा लौकिक भस्म का उपयोग सभी मनुष्य जन कर सकते हैं। ब्राह्मणों को वैदिक मंत्रों का जाप करते हुए भस्म धारण करनी चाहिए तथा अन्य मनुष्य बिना मंत्रों के भस्म धारण कर सकते हैं। उपलों से सिद्ध की हुई भस्म 'आग्नेय भस्मकहलाती है। यह त्रिपुण्ड का द्रव्य है। अन्य यज्ञ से प्रकट हुई भस्म भी त्रिपुण्ड धारण के काम आती है। ललाट अर्थात माथे पर भौहों के मध्य भाग से भौहों के अंत भाग जितना बड़ा त्रिपुण्ड ललाट में धारण करना चाहिए। मध्यमा और अनामिका अंगुली से दो रेखाएं करके अंगूठे द्वारा बीच में सीधी रेखा त्रिपुण्ड कहलाती है। त्रिपुण्ड अत्यंत उत्तम तथा भोग और मोक्ष देने वाला है। त्रिपुण्ड की एक-एक रेखा में नो-नो देवता हैंजो सभी अंगों में स्थित हैं। भस्म को बत्तीससोलहआठ अथवा पांच स्थानों में धारण करें। सिर माथादोनों कानदोनों आंखेंनाक के दोनों नथुनोंदोनों हाथमुंहकंठदोनों कोहनीदोनों भुजदंडहृदयदोनों बगलनाभिदोनों अंडकोषदोनों उरुदोनों घुटनोंदोनों पिंडलीदोनों जांघों और पांव आदि बत्तीस अंगों में क्रमशः अग्निवायुपृथ्वीदेशदसों दिशाएं, दसों  दिगपालआठों वसुंधराध्रुवसोमआमअनिलप्रातःकाल इत्यादि का नाम लेकर भक्ति भाव से त्रिपुण्ड धारण करें अथवा एकाग्रचित्त हो सोलह स्थान में ही त्रिपुण्ड धारण करें। सिरमाथाकण्ठदोनों को  दोनों हाथोंदोनों कोहनियों तथा दोनों कलाइयोंहृदयनाभिदोनों पसलियों एवं पीठ में त्रिपुण्ड लगाकर इन सोलह अंगों में धारण करें। देश तथा काल को ध्यान में रखकर भस्म को अभिमंत्रित कर जल में मिलाना चाहिए। त्रिनेत्रधारीसभी गुणों के आधार तथा सभी देवताओं के जनक और ब्रह्मा एवं रुद्र की उत्पत्ति करने वाले परब्रह्म परमात्मा 'शिवका ध्यान करते हुए 'ॐ नमः शिवायमंत्र को बोलते हुए माथे एवं अंगों पर त्रिपुण्ड धारण कर शिवकृपा के पात्र बन सकते है।

 

- आत्‍माराम यादव पीव वरिष्‍ठ पत्रकार,

श्रीजगन्‍नाथधाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली,

नर्मदापुरम मध्‍यप्रदेश मोबाइल 9993376616

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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