काव्य :
अल्हड़पन
अल्हड़ होना चाहता है ये मन
एक बार,फिर उड़ना चाहता है गगन
छू लेना चाहता है,चाँद, तारों को
हो जाना चाहता है, ज्यों बचपन
स्वतन्त्र,खेलना चाहता भर आंगन
पकड़ना चाहता,चिड़ियाँ, तितलियाँ
दौड़ना चाहता दूर खेतों में
मुट्ठी में भर लेना चाहता हर सपन
बुढ़ापे की चौखट पर पहुँची उम्र
लौटना चाहे, किशोरावस्था या बचपन मे
ये अल्हड़पन जीवित रहता है,
इस उम्र में,सभी के तन,मन मे
ईश्वर ने गढ़ा ,दुख सुख भरा जीवन
अबोध बचपन,सबका होता यादगार
जीना चाहता,व्यक्ति सुखद स्मृतियाँ
ब्रज,पाना चाहते सब अल्हड़पन फिर एक बार
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र ,भोपाल
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