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गुरु पूर्णिमा पर विशेष : गुरु की गलती शिष्य को हमेशा याद रहती है - यही शिक्षा भी बनती है - डॉ बी आर नलवाया शिक्षाविद , मंदसौर


 

गुरु पूर्णिमा पर विशेष :

गुरु की गलती शिष्य को हमेशा याद रहती है - यही शिक्षा भी बनती है


 - डॉ बी आर नलवाया शिक्षाविद , मंदसौर

( _प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल )_

    ।।। भारतीय संस्कृति* में गुरु- शिष्य की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही हैl आज के परिवेश में गुरु _शिष्य संबंध में काफी बदलाव आ रहा है ।शिष्यों को गुरुजनों का आदर सम्मान करने व गुरु  की पूजन करने का दिन गुरु पूर्णिमा है । ऐसा करने से ही गुरुजनों का वरहस्त शिष्य पर सदैव बना रहता है । इसी के कारण आज भी भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण गुरु -शिष्य परंपरा अक्षुण्ण बनी हुई है। 

    कबीर कहते हैं कि भगवान और गुरु दोनों साथ मिले जो गुरु के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। जिस गुरु की और कबीर का संकेत है, उस गुरु के दो चरण है- पहले चरण बुद्धि और दूसरा चरण विवेक है ,जिसने भी गुरु के इन चरणों को मजबूती से   पकड़ लिया उसका गुरूत्व और गुरुत्वाकर्षण बढ़ जाता है। गुरु के लिए कहा भी गया है, कि गुरु वही जो अपने शिष्य से हार जाए । इसलिए गुरु के लिए सर्वश्रेष्ठ मंत्र वाक्य *शीश कटाए गुरु मिले ,तो भी सस्ता जान* *शत प्रतिशत सही है। यह शीश अहंकार का है । हर माह आकाश में पूर्णिमा तिथि को अंधकार में प्रकाश फैलाने वाला चंद्रमा यह संकेत देता है ,कि आकाश सी ऊंचाई और व्यापकता चाहिए, तो इन गुणों को आत्मसात करना चाहिए। 

गुरु ऊपर से कठोर अंदर से निर्मल होते हैं। शिक्षा और संस्कार के लिए गुरु का कठोर अनुशासन भी संस्कार का प्रदाता बनता है । भविष्य में शिष्य गलती नहीं करें ,इसलिए गुरु कठिन अनुशासन में रखते हैं, तथा आखरी शिक्षा भी देते हैं ,

जैसे एक प्रसंग से ज्ञात होता—

     यह घटना  मगध देश की है । एक बार एक महात्मा एक विशाल शिला पर तपस्या में लीन थे। चारों ओर प्रकृति का शासन था ,तभी एक शाही रथ उसे जगह पर आकर रुका। उसे रथ से मगध नरेश उनका पुत्र उतरे । मगध नरेश महात्मा को अपना पुत्र सोपना चाहते थे, ताकि महात्मा के  पास रहकर राजकुमार शिक्षा प्राप्त कर सके। राजा के  बहुत कहनें  पर महात्मा ने उसे अपना शिष्य बना लिया । दिन, महीने और वर्ष बीतने लगे और एक दिन वह समय भी आया ,जब राजकुमार ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली । 

       एक दिन गुरु और शिष्य भिक्षा मांग कर आश्रम लौट रहे थे। तभी गुरु की छड़ी हाथ से छूटकर नीचे गिर गई । राजकुमार जैसे ही गुरु की छड़ी उठाने के लिए झुका। तभी गुरु ने उसकी पीठ पर अपने हाथ से तीव्र प्रहार किया । यह पहला मौका था ,जब गुरु ने बिना कारण उसे पीठा , शिष्य ने पूछा गुरुजी से पीटने का कारण , तो गुरुजी ने टाल दिया। 

     राजकुमार राजमहल लौट आया पिता से आग्रह किया, कि गुरु से पूछे मेरी किस गलती के लिए उन्होंने सजा दी । पिता ने कहा– तुम्हारे गुरु है, कुछ सोच कर ही मारा होगा,।

       कुछ समय बाद राजकुमार गददी पर बैठा ,उसने गुरु को बुलाया और बिना वजह पीटने का कारण पूछा, “महात्मा बोले हे– राजन ! मैं तुम्हें बिना कारण दंडित किया था, जिसकी याद तुम्हें आज भी सता रही है। 

     गलती करने वाला अपने दंड को भूल जाता है परंतु जो गलती नहीं करता वह अपने दंड को कभी नहीं भुलता। तुम कभी किसी निर्दोष को न सताना वरना वह एक दिन तुमसे उसका हिसाब अवश्य लेगा, यह तुम्हें मेरी आखिरी शिक्षा थी। 

गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला व्यक्ति होता है ।इसका यह शाब्दिक अर्थ है-- गुरु का। मार्गदर्शक  सही अर्थों में गुरु वही है ,जो अपने शिष्यों का उचित मार्गदर्शन करें और जो उचित हो उसे  शिष्य को बताएं और आगे शिष्य को बढ़ाए शिष्य को गुरु पर श्रद्धा और विश्वास रखना ।इससे शिष्य के जीवन का कल्याण हो सकता है ।गुरु डांटे ,फटकारते हैं तो उसे सहन करना आना चाहिए। प्राचीन काल में शिष्य गुरु पर आस्था और विश्वास के साथ ही आगे बढ़ते थे। वह गुरु भी डांट फटकार को भी महानता का गुण मानते थे। गुरु शिष्य की परीक्षा लेते थे, समर्पण भाव हो तो गुरु भवसागर से पार लगा देते थे

       गुरु वह व्यक्ति हैं —जो ज्ञान से परिपूर्ण रहता है, गुरु शिष्य को नवजीवन प्रदान करता है, गुरु शिक्षा का सागर होता है, 

गुरु के बारे में— यह ज्ञान का भंडार है ,गुरु है -मंदिर जैसे पूजा घर । गुरु न देखता– जात-पात।  ना गुरु करता पक्षपात ,निर्धन हो या धनवान गुरु के पास सब एक समान। 

 गुरु के बिना ज्ञान नहीं ,ज्ञान के बिना कोई नहीं, भटक जाता है जब इंसान ,तब गुरु ही देता है ज्ञान।

सिकंदर के गुरु अरस्तु की कहानी भी बहुत ज्ञान प्रदान करती है। गुरु ज्ञान का भंडार है, गुरु शिष्य को नवजीवन प्रदान करता है। गुरु शिक्षा का सागर है, गुरु महान व्यक्ति होता है जो अच्छा इंसान बनाता है, वह गुरु है हमारी कर्मों को बताता है, वह गुरु है जो हमेशा इंसानियत को बताता है ,वह गुरु है हमारे अंदर जो विश्वास जगाता है, वह गुरु है।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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