काव्य :
हम सब की कहानी
कौन हूं, क्यों हूं, मैं किसलिए हूं ?
ये तो जैसे अब सोचना ही छोड़ दिया है।
उम्मीदों के इन बोझों ने ना जाने कैसे,
इस बदन को ही तोड़ दिया है।
सरल था, सीधा ही तो चल रहा था मैं भी,
वक्त ने तो जैसे, रस्ता ही मोड़ दिया है।
मुझमें कभी *मैं* भी हुआ करता था,
अब तो ये *मैं* भी मुझको छोड़ गया है।
इस जीवन की आपाधापी में,
कौन हूं, क्यों हूं, मैं किसलिए हूं,
ये तो जैसे अब सोचना ही छोड़ दिया है।
यह सिर्फ मेरी ही नहीं,
हम सब की कहानी है।
संघर्षों के पथ पर चलते रहना,
यही तो हर पुरुष की निशानी है।
जिम्मेदारियों का बोझ ढोते हुए,
क्या कहे और किससे कहे,
हर पुरुष ने अब सोचना ही छोड़ दिया है।।
-प्रमोद सामंतराय
सरायपाली (महासमुंद)
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