काव्य :
अतिचार किया है
सांसों पर अधिकार किया है ।
हां इतना विस्तार किया है ।
साबित बचा नहीं घर कोई ।
बस्ती को मिsमार किया है ।
मुस्कानें नोची चेहरों से।
दूर कहीं भंडार किया है।
हम सबसे था बैर कभी का ।
इतना दुर्व्यवहार किया है ।
हाथ उठा दो उसके हक में।
यह कैसा अतिचार किया है।
- आर एस माथुर , इंदौर
मिस्मार। ध्वस्त
अतिचार*दुर्व्यवहार
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काव्य
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मैने भी व्यविचार किया है
ReplyDeleteये कैसा अतिचार किया है
जीवन के दुखों का मैने पुनः आज विचार किया है
सुंदर रचना sir 🙏