काव्य :
रिश्ता
कभी सोचती हूं कि जब भी
जन्मदिवस हो,शादी की सालगिरह हो, फेस्टिवल हो
तब बाहर दोस्तों में पार्टी देना
मुझे याद करना
मेरी बातें करना
तुम्हारे दोस्तों को
सबको कितना महसूस होता है
कि तुम्हारे जैसा पार्टनर मिलना
कितनी खुश नसीबी है
और तुम्हे खडूस सी बीवी मिली
कितना ज्यादा मेरे बिना अकेलापन
महसूस करते हो तुम
पर क्या जब मैं तुम्हारे दोस्तों के बीच हुई
पुराने दोस्तों में सिगरेट का धुआं था
अभी में ढोल मंजीरे
तब तुम कंफरटेबल रहे मेरे साथ
नहीं ना,तुम्हे बुरा लगा मेरा वहां रहना
क्योंकि मैं कभी उस टाइप की नहीं रही
फिर सामाजिक मर्यादा तो मेरे लिए ही बनी थी ना
तुम पुरुष हो
आधी रात बाहर रह सकते हो
मुझे बच्चे,मां घरबार सब देखना है
तुम्हे अपनी इमेज बना कर रखनी है
शरीफ,बेचारा,कितनी सेवा करता है
वगैरह वगैरह
क्या कभी घर में इमेज बनाने की
सोची?
एक बार कभी
कभी भी जिंदगी में
वो
बीवी की जिम्मेदारी है
घर में पति की छवि सबसे बेहतर
रूप में लाना
लेकिन कभी घर आकर तुम्हें लगा
पूरा दिन अकेले तुम्हे ही याद करके
मैने एक पल भी कैसे बिताया
रिश्तेदारों से कैसे नम आंखें छुपाई
कैसे मुस्कुराई
तुमसे नाराज होने का नाटक किया
लेकिन तुम तो 12,13 घंटे बाहर बिता कर आए थे
तो मनाने कैसे आते
थक गए थे ना
फिर मैने आधी रात में चाय कॉफी भी नहीं पूछी
सॉरी ना
गलती तो मेरी थी क्यूंकि
उम्मीद नहीं छोड़ी इतने सालों बाद भी
"तुम्हारे साथ" होकर सबके साथ
फेस्टिवल मनाने की
क्योंकि ज्यादातर सबके
साथ मैं तो हुई,लेकिन
कभी तुम मेरे साथ ना हुए
तुम सही कहते हो
मुझे नहीं दिखता,तुम कितना व्यस्त रहते हो काम में
परेशान होते हो
मेरी वजह से।
दिल दुखता है मेरा भी
कभी कभी
यूं ही।
- मिष्टी गोस्वामी
दिल्ली
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