काव्य :
बेटियां
जिनके होने से ही
झंकृत होता है घर आंगन,
सारे सुरों की वो
झंकार होती हैं बेटियां,
अपने मीठे बोलों से
जो बुन देती है खुशियां,
ऐसी ही नायाब सी
फनकार होती हैं बेटियां ।
कभी पापा की परी तो कभी
मां की लाडो बन जाती हैं,
इस घर उपवन को अपने
हंसी से चहकाती हैं बेटियां।
कोई जगह ही नहीं होती
कभी किसी उदासी की,
हरदम अपनी खुशियों से
घर को महकाती है बेटियां।
जिनके होने से ही
खिल उठता है मन,
पूरब की ऐसी ही
पुरवाई सी होती हैं बेटियां।
चाह कर भी हम
रोक ना पाएं जिन्हें,
कुछ ऐसी ही
परछाई सी होती है बेटियां।
खिलखिलाता है हरदम
जिनसे आंगन हमारा,
वो बेटियां भी
एक दिन चली जाती हैं,
क्या करें दस्तूर
है ये जमाने का
न जाने बेटियां
क्यों बड़ी हो जाती हैं।
उदास गुमसुम सा घर का
हो जाता है हर कोना,
न पैरों की आहट,
न ही सुनाई देती वह मीठी बोली,
सारी खुशियों को
एक दिन समेट जाती हैं,
ना जाने बेटियां
क्यों बड़ी हो जाती हैं ।
- प्रमोद सामंतराय
सरायपाली महासमुंद (छ.ग.)
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