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महात्मा बुद्ध के पवित्र अवशेष रूस में प्रदर्शित - सत्य प्रकाश , नई दिल्ली


 

महात्मा बुद्ध के पवित्र अवशेष रूस में प्रदर्शित

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सत्य प्रकाश

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रूस के प्रांत काल्मिकिया की राजधानी एलिस्टा में पवित्र बौद्ध अवशेषों को पहली बार एक प्रदर्शनी में रखा गया है। ये अवशेष नगर के मुख्य बौद्ध मठ में स्थापित किए जाएंगे, जिसे गेडेन शेडुप चोइकोरलिंग मठ के नाम से जाना जाता है। इसे "शाक्यमुनि बुद्ध का स्वर्णिम निवास" भी कहा जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तिब्बती बौद्ध केंद्र है, जिसे वर्ष 1996 में जनता के लिए खोला गया था और यह काल्मिक मैदानों से घिरा हुआ है।

विशाल घास के मैदान काल्मिकिया क्षेत्र की विशेषता हैं। हालांकि इसमें रेगिस्तानी क्षेत्र भी शामिल हैं, और यह रूस के यूरोपीय क्षेत्र के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है, जो कैस्पियन सागर की सीमा से लगा हुआ है। काल्मिक, ओइरात मंगोलों के वंशज हैं, जो 17वीं शताब्दी के आरंभ में पश्चिमी मंगोलिया से आकर बसे थे। उनका इतिहास खानाबदोश जीवन शैली से गहराई से जुड़ा है, जो उनकी संस्कृति को प्रभावित करता है। वे यूरोप में एकमात्र जातीय समूह हैं जो महायान बौद्ध धर्म का पालन करते हैं।

पवित्र अवशेष को नयी दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय से वरिष्ठ भिक्षुओं द्वारा पूर्ण धार्मिक पवित्रता और प्रोटोकॉल के साथ भारतीय वायु सेना के एक विशेष विमान से काल्मिकिया ले जाया गया है। प्रदर्शनी में तिब्बती बौद्ध धर्म के शाक्य संप्रदाय के प्रमुख, परम पूज्य 43वें शाक्य त्रिजिन रिनपोछे, द्रेपुंग गोमांग मठ के परम पूज्य 13वें कुंडलिंग तकत्सक रिनपोछे, परम पूज्य 7वें योंगजिन लिंग रिनपोछे और 17 अन्य वरिष्ठ भिक्षुओं ने भी हिस्सा लिया।

"बुद्ध के जीवन की चार महान घटनाओं" को दर्शाती मूर्तिकला और कलाकृतियों की तीन प्रदर्शनियां लगायी गयी हैं। एक अन्य प्रदर्शनी शाक्य वंश की राजधानी, प्राचीन कपिलवस्तु, पिपरहवा से शाक्यों की पवित्र विरासत - बुद्ध अवशेषों की खुदाई और प्रदर्शनी पर आधारित है। राष्ट्रीय संग्रहालय की इस प्रदर्शनी में "स्थायित्व की कला - अपने राष्ट्रीय संग्रह, दिल्ली से बौद्ध कला" प्रदर्शित की गयी। प्रख्यात कलाकार पद्मश्री वासुदेव कामथ ने भी इस कार्यक्रम में अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन किया। 

प्रदर्शनी में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों का संदूक रखा गया है। इसके अलावा उनके जीवन के दृश्यों को दर्शाने वाला मन्नत स्तूप भी प्रदर्शित  है। यह स्तूप लगभग 10 वीं शताब्दी ई. में पाल वंश काल का है और  नालंदा, बिहार से प्राप्त हुआ है। यह कांस्य का है जिसकी चौड़ाई 30 सेमी और  ऊंचाई 20 सेमी है। 

हाल ही में बुद्ध के पवित्र अवशेषों को मंगोलिया, थाईलैंड और वियतनाम ले जाया गया। राष्ट्रीय संग्रहालय में रखे पिपरहवा अवशेषों को वर्ष 2022 में मंगोलिया ले जाया गया, जबकि सांची में स्थापित बुद्ध और उनके दो शिष्यों के पवित्र अवशेषों को वर्ष 2024 में थाईलैंड में प्रदर्शनी के लिए ले जाया गया। इस वर्ष 2025 में, सारनाथ से बुद्ध के पवित्र अवशेषों को वियतनाम ले जाया गया। रूस के लिए ये अवशेष नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय की 'बौद्ध गैलरी' में पूजा के लिए रखे गए हैं। काल्मिकिया ले जाए जा रहे पवित्र अवशेष राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थित इसी अवशेष से संबंधित हैं।

हांगकांग से पिपरहवा अवशेषों से जुड़े रत्नों को सफलतापूर्वक वापस लाने में भारत सफल रहा, जहां उनकी नीलामी की जा रही थी। 

भगवान बुद्ध शाक्य वंश के थे, जिनकी राजधानी कपिलवस्तु में स्थित थी। वर्ष 1898 में एक उत्खनन के दौरान उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में बर्डपुर के पास पिपरहवा में एक लंबे समय से विस्मृत स्तूप में अस्थियों के टुकड़े, राख और रत्नों से भरे पांच छोटे कलश खोजे गये थे।

बाद में वर्ष 1971 और वर्ष 1977 के बीच पिपरहवा स्थल पर और खुदाई की गयी। यहां से जली हुई अस्थियों के टुकड़ों से भरा एक संदूक मिला और उन्हें चौथी या पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व का बताया गया। 

  - सत्य प्रकाश

      नई दिल्ली

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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