काव्य :
दीपावली की फुलझड़ियां--
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(1)
दीपावली के आते ही श्रीमती
जी बोल उठीं,
भाग्य अपने जागेंगे सोने की
चीज़ें ले लो जी।
हंस के मैंने ये कहा अभी गया
और अभी आया,
झट बाज़ार जाके मैंने सुन्दर दो तकिए ले आया।
(2)
दीपावली के आते ही मित्र
मुझ से पूछ रहे,
कोई ऐसी फुलझड़ी जो देर
तक जलती रहे।
मैंने कहा इसमें क्या बात है
युक्ति है इक काम की,
जब पत्नी तैयार हो जाएं कर
दो तारीफ पड़ौसन की।
(3)
दीपावली के आते ही सब बूढ़े बच्चे बाहर निकलें,
वो भी निकले जो मौका ढूंढें मनचले थे ।
जो पड़े डण्डे उनको, तबले
दोनों सूज गए,
महिला एसपी ख़ुद घूमेंगी ये
न्यूज़ पढ़ना भूल गए।
(4)
दीपावली पर दीप जलाओ पर
न जलाओ मनको,
कहें ऋषुवर कविराय जनों से
ऐसा दीप जलाओ,
करके रौशन अंत को ख़ुद से
ख़ुद को ही मिलाओ।
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-डा.ऋषु, छिंदवाड़ा (म.प्र.)
8421485353
पूर्व निदेशक आकाशवाणी
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काव्य
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