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आवश्यकता है रविन्द्र नाथ टैगोर की मौन प्रार्थना की… - डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम


 

आवश्यकता है रविन्द्र नाथ टैगोर की मौन प्रार्थना की…

 - डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम


देश की माटी देश का जल , हवा देश की देश के फल ।

सरस बनें प्रभु सरस बने , देश के घर और देश के घाट ।

देश के वन और देश के बाट ,सरल बनें प्रभु सरल बनें प्रभु ।

देश के तन और देश के मन ,विमल बनें प्रभु विमल बनें ।।

उपरोक्त पंक्तियां रविन्द्र नाथ टैगोर ने उस समय लिखी थी जब देश अंग्रेजों के अधीन था। समाज में फैली कुरितियों ने अंधकार फैला रखा था। विश्व में प्रथम विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। बिस्मार्क की कूटनीति ने विश्व के शक्ति संतुलन को असंतुलित कर दो भागों में बांट दिया था । ऐसे समय में रविन्द्र नाथ टैगोर ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि प्रभु हवा,पानी,माटी,जंगल ही नहीं तन मन सबको पवित्र बनादे।

विडम्बना देखिये जिस देश का साहित्यकार अपने लेखनी के शब्दों से मौन प्रार्थना करता है कि सब कुछ सरस और विमल बने उस देश की हवा सांस लेने लायक नहीं, पानी इतना जहरीला कि आम जनता के जीवन पर संकट बन गया, मिट्टी जहरीली फसल उगल रही है।

मौत की आंखों में न जाने कितने अनुत्तरित सवाल हैं जिनका जवाब तब तक नहीं मिलेगा जब तक हमारी शिक्षा पद्धति सवाल करना नहीं सिखायेगी। शासन - प्रशासन , राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर चिंतन नहीं काम करे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की ये पंक्तियाँ केवल काव्य नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत प्रार्थना हैं—ऐसी प्रार्थना जो मनुष्य, प्रकृति और समाज को एक ही नैतिक सूत्र में बाँधती है। औपनिवेशिक भारत के अँधेरे समय में लिखी गई यह रचना उस युग की ऐतिहासिक, सामाजिक और वैश्विक बेचैनियों की साक्षी है। एक ओर अंग्रेज़ी शासन की दमनकारी संरचना, दूसरी ओर समाज में व्याप्त कुरीतियाँ, और तीसरी ओर विश्व मंच पर प्रथम विश्व युद्ध के मंडराते बादल—इन सबके बीच टैगोर की चेतना ईश्वर से किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि सरलता, सरसता और विमलता की याचना करती है।

 राष्ट्रवाद, जो एक समय मुक्ति का स्वप्न था, धीरे-धीरे हिंसक विस्तारवाद में बदल रहा था। टैगोर इस संकीर्ण राष्ट्रवाद के प्रखर आलोचक थे। उनके लिए राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-नैतिक चेतना का विस्तार था। इसीलिए उनकी प्रार्थना में “देश की माटी, देश का जल, देश की हवा” केवल भौगोलिक तत्व नहीं, बल्कि जीवन की पवित्र शर्तें हैं। उनका मानना था कि प्रकृति, समाज और नैतिकता का त्रिकोण सामाजिक व्यवस्था का संतुलन है।

टैगोर की दृष्टि में प्रकृति का दूषित होना मनुष्य के नैतिक पतन का परिणाम है। “देश के तन और देश के मन” को एक साथ विमल बनाने की कामना इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बाहरी शुचिता आंतरिक पवित्रता से अलग नहीं हो सकती। जंगल, घाट, बाट और घर—ये सभी सभ्यता की सामूहिक स्मृति के प्रतीक हैं। जब ये सरस होंगे, तभी मनुष्य का संबंध अपने परिवेश से मानवीय रह पाएगा।

विडम्बना यह है कि स्वतंत्रता के दशकों बाद वही देश आज हवा, पानी और मिट्टी के संकट से जूझ रहा है। वायु इतनी विषाक्त हो चुकी है कि साँस लेना जोखिम बन गया है; देहली ही नहीं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश कलकत्ता,आदि महानगरों में सांस लेने लायक हवा नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली  को आये दिन स्कूलों के लिए अवकाश घोषित करना पड़ता है।

 अकेले मध्य प्रदेश में ही विभिन्न परियोजनाओं के लिए लगभग 15 लाख (1.5 मिलियन) पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव था, जिस पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा है। अकेले सिंगरौली जिले में एक कोयला ब्लॉक परियोजना के लिए लगभग 6 लाख (0.6 मिलियन) पेड़ काटने का विरोध हुआ था। महू-खंडवा रेल परियोजना के लिए लगभग 1.24 लाख (0.124 मिलियन) पेड़ काटे जाने की संभावना थी। अवैध कटाई के मामलों में, भोपाल के पास PWD द्वारा कथित तौर पर 488 पेड़ और सागर जिला कलेक्ट्रेट से 1,000 पेड़ बिना अनुमति के हटा दिए गए थे। उत्तर प्रदेश में कांवर यात्रा मार्ग के अंतर्गत राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) को सौंपी गई एक रिपोर्ट के अनुसार, कानपुर यात्रा मार्ग के लिए गाजियाबाद, मेरठ और मुजफ्फरनगर जिलों में 17,607 पेड़ काटे गए थे, जिसके लिए राज्य सरकार ने अनुमति नहीं ली थी। एक अन्य परियोजना के लिए ऊपरी गंगा नहर के किनारे सड़क निर्माण हेतु 33,776 परिपक्व पेड़ और 78,946 पौधे काटे जाने की जानकारी सामने आई थी। ये कुछ ही उदाहरण है इस बात के प्रमाण है कि हवा को जहरीली करने में मानव निर्मित परिस्थितियां ही उत्तरदाई है ।

जल जीवनदायी न रहकर ज़हर बनता जा रहा है । इंदौर की जल प्रदूषण से हुई मौतों ने जीवन के मूल अधिकार पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है । आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षित पानी की कमी के कारण हर साल लगभग 2 लाख मौतें होती हैं । एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल लगभग 3.77 करोड़ भारतीय जल से होने वाली बीमारियों से प्रभावित होते हैं । जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच दूषित नल के पानी से 34 मौतें और 5,500 बीमार पड़ने की खबरें हैं, जिनमें डायरिया प्रमुख था ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार अनुमान है कि भारत में 21% संक्रामक रोग पानी से संबंधित हैं ।इन मौतों के मुख्य कारण आम जनता से लेकर नीति निर्माता तक जानते हैं। सीवेज प्रदूषण जिसमें बिना उपचारित सीवेज का पानी पीने के पानी में मिलता है।ज्ञऔद्योगिक और कृषि अपशिष्ट रसायन और भारी धातुएं पीने और स्नान के पानी में मिलती हैं । जर्जर और पुराने पाइपों से सीवेज का पानी रिसना । पानी में जैविक तत्वों की उच्च सांद्रता आदि कारण सबको पता है पर स्वार्थ के व्यवहार के आगे सब कुछ शून्य है।

और मिट्टी, जो अन्न उगलती थी, अब रासायनिक निर्भरता की कैदी है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सभ्यतागत विफलता का संकेत है—जहाँ विकास ने विवेक को और लाभ ने लोकहित को पराजित कर दिया है।

टैगोर का विश्वास था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि प्रश्न करना सिखाना है। आज भी “मौत की आँखों में अनुत्तरित सवाल” इसलिए टिके हैं क्योंकि हमारी शिक्षा पद्धति आज्ञाकारी नागरिक तो गढ़ती है, चिंतनशील मनुष्य नहीं। जब तक सवाल पूछने की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक शासन-प्रशासन राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर दूरदर्शी निर्णय नहीं ले पाएगा। लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं, बल्कि सतत विवेकपूर्ण संवाद से जीवित रहता है।

टैगोर की यह मौन प्रार्थना आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाती है कि राष्ट्र का स्वास्थ्य केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि हवा की शुद्धता, पानी की पारदर्शिता, मिट्टी की उर्वरता और मनुष्य की नैतिक चेतना से मापा जाता है। “सरल बनें, सरस बनें, विमल बनें”—ये शब्द आज भी समाधान का मार्ग दिखाते हैं, बशर्ते हम उन्हें केवल कविता नहीं, बल्कि नीति, शिक्षा और जीवन-पद्धति का आधार बनाएँ।

यह आलेख हमें चेतावनी भी देता है और आशा भी—कि यदि मनुष्य अपने प्रश्नों से डरना छोड़ दे और सत्ता अपने स्वार्थ से ऊपर उठे, तो टैगोर की प्रार्थना अभी भी पूरी हो सकती है।


 - डॉ हंसा व्यास नर्मदापुरम

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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