काव्य :
सुबह सुबह
तुम्हारे आने की बात कह
मैं तुम्हारा अपमान नहीं करूंगा
क्योंकि तुम जाते ही नहीं
और, मैं समझता हूँ तुम चले गए।
जब ठंडी बयार बहती है
मेरे अंतस् में विराज कर
आनंद लेते हो
खिड़की के पास दिखे
खिले फूल में प्रवेश कर
मेरी नजरों में कुछ भरते हो।
द्वार खोलते ही कुत्ते के
होठों में मंद मंद मुस्कान
उसके प्यार को जताती है
और रोटी से उसकी संतुष्टि
पूरे जगत् में संतोष भरती है।
हर बार एक ही चूक होती है
हर आहट पर तुम्हारे आने की
पर तुम रहते हो अंतस् में
और बाहर देखता हूँ मैं
आहट का स्वर अंदर आता है
द्वार खुलते ही दूर चला जाता है।
आहट कान सुनते हैं
दृश्य आंख देखती है
अनुभव कहीं तो होता है
तुम्हें कौन देखे सुने महसूसे
यह समझ नहीं आता
अपने मिलने का एहसास
करादो न एक दिन।।
- डॉ सत्येंद्र सिंह , पुणे, महाराष्ट्र
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बेहद उम्दा रचना।हार्दिक बधाई!
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