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काव्य : मेरे घर के सामने - डॉ सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र

 

काव्य : 
मेरे घर के सामने 

मेरे घर के सामने 
अशोक का पेड़ है 
वसंत की बहार है 
कोमल पत्तों की 
बौछार है
बड़े कोमल और
सुनहरे पत्ते हैं 
छोटी छोटी चिडियों ने 
घोंसले बना लिए हैं 
चीं चीं की आवाज 
आती रहती है 
अशोक की डालियाँ
नीचे झुक गई हैं 
लालामी लिए 
हरे हरे पत्तों ने
मेरे घर का दरवाजा 
ढंक दिया है 
मैं डालियों को 
छाँटना चाहता हूँ 
हँसिया लेकर 
जब भी पास जाता हूँ
डालियाँ छाँटने
कोमल पत्ते 
मुस्कुरा उठते हैं 
और मेरे चेहरे पर भी 
मुस्कान आ जाती है 
हँसिया लिए घर में 
चला आता हूँ 
डाली पत्ते काटने की
हिम्मत नहीं होती।

पता नहीं लोग
पेड़ कैसे काट
देते हैं।
                -  डॉ सत्येंद्र सिंह 
                   पुणे, महाराष्ट्र
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

2 Comments

  1. सत्येंद्र सिंह जी,
    यह वात्सल्य भाव जबतक मनुष्य में जीवित रहेगा, तभी विश्व हरियाली से भरा रहेगा। हार्दिक बधाई🎉🎊

    लतिका जाधव

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  2. धन्यवाद सोनी जी।

    ReplyDelete
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