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लघुकथा : प्रश्नविहीन - डॉ. सत्येंद्र सिंह , पुणे, महाराष्ट्र


 लघुकथा : 

प्रश्नविहीन

प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में  और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ।  भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की  खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।

सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं। 

एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।

प्रतीक की बोलती बंद।  जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड  देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।


      -  डॉ. सत्येंद्र सिंह

          पुणे, महाराष्ट्र

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. सत्येंद्र सिंह जी,
    गंभीर प्रश्नों को कथा के माध्यम से उजागर किया है। आपको हार्दिक बधाई🎉🎊

    लतिका जाधव

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