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काव्य : समझे क्या कुछ लल्लू - उपमेन्द्र सक्सेना, एडवोकेट , बरेली


 

काव्य : 

समझे क्या कुछ लल्लू

गीत


कुटिल समय ने झाड़ लिया है 

मानवता से पल्लू। 


सम्बन्धों पर हुआ अचानक

जब से पैसा हावी

जीवन के दरिया में खोई

अपनेपन की चाबी

हाथ लगा है विश्वासों को

बाबा जी का ठुल्लू। 


लोभ -लालसा छीन रही है

निष्ठाओं का हिस्सा

किया शरीकों ने ही मिलकर

खतम मुनन का किस्सा

बना रही है बिकी व्यवस्था 

पीड़ित जन को उल्लू। 


लाभ उठाती लाचारी  का 

अवसरवादी छाया

गाँधीवादी आदर्शों पर

है खतरे का साया

सद्भावों की फसल रौंदता

आज गली का कल्लू। 


निर्धन मुनिया की शादी को

लाया कपड़ा- लत्ता

खींच मदद का फोटो उसने 

काम किया फिर सस्ता

स्वाभिमान को ठेस लगाता

क्यों जनसेवी मल्लू ? 


पास नहीं है जिसके धनबल

कौन पूछता उसको

संवेदन का गला काटकर

कहती दुनिया खिसको

आज नोट की बोले तूती 

समझे क्या कुछ लल्लू। 


- उपमेन्द्र सक्सेना, एडवोकेट

'कुमुद- निवास', बरेली (उत्तर प्रदेश) 

मोबा.- 9837944187

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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